उत्तर प्रदेश
अटल जी के प्रति देश-प्रदेश के अनुराग व प्रेम को व्यक्त करते हैं ‘युवा कुम्भ’ जैसे आयोजनः सीएम योगी
लखनऊ| मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ‘युवा कुम्भ’ जैसे आयोजन श्रद्धेय अटल जी के प्रति देश-प्रदेश के अनुराग व प्रेम को व्यक्त करते हैं। यहां के जनप्रतिनिधियों ने अटल जी की स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए सभी संस्थाओं को एक मंच दिया है। युवा कुम्भ उन स्मृतियों को ताजा कर रहा है, जो भारत की सनातन धर्म की परंपरा में कुम्भ के आयोजन के साथ जुड़ती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रक्षा मंत्री व लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह के साथ मंगलवार को केडी सिंह बाबू स्टेडियम में ‘अटल युवा महाकुम्भ’ का शुभारंभ किया। ‘भारत रत्न’ अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म शताब्दी वर्ष पर ‘कदम से कदम मिलाकर चलना होगा’ थीम पर यह आयोजन हुआ। सीएम व रक्षा मंत्री ने बच्चों को दुलारा-पुचकारा और चॉकलेट बांटी। निबंध व भाषण प्रतियोगिता के बच्चों को भी पुरस्कृत किया गया।
भारत की पहचान है कुम्भ
सीएम योगी ने कहा कि कुम्भ भारत की पहचान है। सनातन व आध्याात्मिक ऊर्जा की अनुभूति का समागम है, उस महासमागम का जो दृश्य 13 जनवरी से 26 फरवरी तक प्रयागराज में दिखेगा, उसकी झांकी आज यहां देखने को मिल रही है।सीएम ने अटल जी की कविता ‘कदम मिलाकर चलना होगा’ सुनाई। बोले-इस युवा कुम्भ ने अटल जी की स्मृतियों को ताजा किया है।
युवा ऊर्जा का प्रतीक है यह कार्यक्रम
सीएम ने कहा कि मैंने सुबह आयोजकों को फोन कर पूछा कि कार्यक्रम होगा, तो बताया गया कि यह युवा ऊर्जा का प्रतीक कार्यक्रम है। कार्यक्रम भव्यता से होगा। वास्तव में, आज मौसम की परवाह किए बिना बच्चों ने अटल जी की स्मृतियों को याद किया है। सीएम ने कहाकि कल अटल जी का जन्म शताब्दी वर्ष है और आज उसका शुभारंभ इतनी भव्यता से हो रहा है। सीएम ने प्रतियोगिताओं में स्थान प्राप्त करने वाले बच्चों को बधाई दी। प्रतिभागी बच्चों को शुभकामना देते हुए कहा कि कदम मिलाकर चलेंगे तो लक्ष्य प्राप्त होगा। सीएम ने आयोजन में शामिल सभी संस्थाओं को भी साधुवाद दिया।
इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा, महापौर सुषमा खर्कवाल, विधान परिषद सदस्य डॉ. महेंद्र सिंह, इंजी. अवनीश सिंह, पवन सिंह चौहान, विधायक डॉ. नीरज बोरा, योगेश शुक्ल, अमरेश कुमार, ओपी श्रीवास्तव, जय देवी, पूर्व मंत्री मोहसिन रजा आदि मौजूद रहे।
उत्तर प्रदेश
प्रयागराज में स्थित है महर्षि दुर्वासा का आश्रम, जिनके श्राप के कारण हुआ था समुद्र मंथन
महाकुम्भ। सनातन संस्कृति में तीर्थराज, प्रयागराज को यज्ञ और तप की भूमि के रूप में जाना जाता है। वैदिक और पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रयागराज में अनेक देवी, देवताओं और ऋषि-मुनियों ने यज्ञ और तप किये हैं। उनमें से ही एक है ऋषि अत्रि और माता अनसूईया के पुत्र महर्षि दुर्वासा। महर्षि दुर्वासा को पौरिणक कथाओं में उनके क्रोध और श्राप के लिए जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण ही देवता शक्तिहीन हो गये थे। तब देवताओं ने भगवान विष्णु के कहने पर असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन किया था। महर्षि दुर्वासा की तपस्थली प्रयागराज के झूंसी में गंगा तट पर स्थित है। मान्यता है कि अपने क्रोध के कारण ही महर्षि दुर्वासा को प्रयागराज में शिव जी की तपस्या करनी पड़ी थी।
महर्षि दुर्वासा के श्रापवश देवताओं को करना पड़ा था समुद्र मंथन
पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन में निकली अमृत की बूंद गिरने के कारण ही प्रयागराज में महाकुम्भ का पर्व मनाया जाता है। पुराणों में समुद्र मंथन की कई कथाएं प्रचलित हैं, उनमें से एक कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण ही देवताओं को असुरों के साथ मिल कर समुद्र मंथन करना पड़ा था। कथा के अनुसार एक बार देवराज इंद्र, हाथी पर बैठ कर भ्रमण कर रहे थे, महर्षि दुर्वासा ने उनको आशीर्वाद स्वरूप फूलों की माला पहनने को दी। देवराज इंद्र ने अपनी शक्ति के मद में महर्षि दुर्वासा की ओर ध्यान नहीं दिया और उनकी दी हुई माला को अपने हाथी को पहना दिया। हाथी ने फूलों की महक से परेशान होकर माला को गले से उतार कर पैरों से कुचल दिया। यह सब देखकर महर्षि दुर्वासा ने क्रोधवश देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं को शक्तिहीन होने का श्राप दे दिया। तब देवता निराश हो कर विष्णु जी के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को पुनः शक्ति और अमरत्व प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन करने को कहा। अंततः महर्षि दुर्वासा के श्राप से मुक्ति और अमरत्व प्राप्त करने के लिए देवताओं ने समुद्र मंथन किया था।
महर्षि दुर्वासा द्वारा स्थापित शिवलिंग के पूजन से मिलता है अभयदान
महर्षि दुर्वासा आश्रम उत्थान ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष शरत चंद्र मिश्र जी ने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार परम विष्णु भक्त इक्षवाकुवंशीय राजा अंबरीष को क्रोधवश गलत श्राप देने के कारण सुदर्शन चक्र, महर्षि दुर्वासा को मारने के लिए पीछा करने लगे। महर्षि को भगवान विष्णु ने अभयदान के लिए प्रयागराज में संगम तट से एक योजन की दूरी पर भगवान शिव की तपस्य़ा करने को कहा। महर्षि दुर्वासा ने गंगा तट पर शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव का तप और पूजन किया, जिससे उन्हें अभयदान मिला। पौराणिक मान्यता है कि महर्षि द्वारा स्थापित शिवलिंग के पूजन से अभयदान मिलता है।
प्रयागराज के झूंसी में गंगा तट पर स्थित है महर्षि दुर्वासा का आश्रम
दूर्वा अर्थात दूब घास को ही अपना आहार बनाने वाले महर्षि दुर्वासा का आश्रम प्रयागराज में झूंसी क्षेत्र के ककरा दुबावल गांव में स्थित है। यहां महर्षि दुर्वासा के आश्रम में एक प्राचीन शिव मंदिर है। मान्यता है कि मंदिर में शिव लिंग की स्थापना स्वयं दुर्वासा ऋषि ने ही की थी। मंदिर के गर्भगृह में साधना अवस्था में महर्षि दुर्वासा की प्रतिमा भी स्थापित है। साथ ही मंदिर के प्रांगण में अत्रि ऋषि, माता अनसुइया, दत्तात्रेय भगवान, चंद्रमा, हनुमान जी और मां शारदा की प्रतिमाएं भी है। महर्षि दुर्वासा को वैदिक ऋषि अत्रि और सती अनसुइया का पुत्र और भगवान शिव का अंश माना जाता है। भगवान दत्तात्रेय और चंद्रमा उनके भाई हैं। सावन मास में यहां प्रतिवर्ष मेला लगता है तथा मार्गशीर्ष माह की चतुर्दशी के दिन दुर्वासा जंयति मनाई जाती है।
महाकुम्भ में पर्यटन विभाग ने करवाया है दुर्वासा आश्रम और शिव मंदिर का जीर्णोद्धार
महाकुम्भ 2025 के दिव्य, भव्य आयोजन में सीएम योगी के निर्देश के अनुरूप प्रयागराज के मंदिर और घाटों का जीर्णोद्धार हो रहा है। इसी क्रम में पर्यटन विभाग ने महर्षि दुर्वासा आश्रम का भी जीर्णोद्धार कराया है। मंदिर के प्रवेश मार्ग पर रेड सैण्ड स्टोन के तीन विशाल द्वार का निर्माण हुआ है। मंदिर की पेंटिग और लाईटिंग का कार्य भी करवाया जा रहा है। महाकुम्भ में संगम स्नान करने वाले श्रद्धालु अभयदान पाने के लिए महर्षि दुर्वासा आश्रम और शिवलिंग का पूजन करने जरूर आते हैं।
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