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15 साल बाद ‘भारतीय अम्मा’ की घर-वापसी, कानपुर के इस सरकारी अस्पताल की नर्सों ने लिखी इंसानियत की अनुपम मिसाल

कानपुर : आपने वो कहावत जरूरी सुनी होगी के दिल के रिश्ते कभी कभी खून के रिश्तों से ज़्यादा मजबूत और वफादार साबित होते हैं, ऐसा ही दिल को छू लेने वाला एक मामला कानपुर से सामने आया है । जहां कानपुर के उर्सला अस्पताल में ये नजारा देखकर उस हर आंख नम नज़र आई ।

जानकारी के अनुसार 75 साल की एक बुजुर्ग महिला वर्ष 2010 में तेलंगाना से लापता हो गयी थी । जो जाने किस तरह से कानपुर आ पहुँची । ऐसे में जब मानसिक स्वास्थ्य और परेशानी से जूझ रही ये महिला अप्रैल माह के वर्ष 2023 में कानपुर पुलिस को मिली तो उन्होंने इस महिला को सकुशल उनके घर पहुंचाने का प्रयास किया । लेकिन बुजुर्ग महिला तेलंगाना की रहने वाली थी तो उसकी भाषा यहां के ज्यादातर लोगों को समझ नही आ रही थी जिसके बाद पुलिस ने उनकी मानसिक स्थिति को देखते हुए कानपुर के उर्सला अस्पताल में भर्ती करवा दिया ।

यही से शुरू हुई इस अनजान रिश्ते पर मर मिटने वाले प्यार की दास्ताँ जहाँ बुजुर्ग महिला की सेवा और देखरेख में पूरा स्टाफ़ और डॉक्टर इस कदर लग गया जैसे इस महिला से उनका कोई जन्म जन्मांतर का रिश्ता हो । धीरे धीरे दिन, महीने, साल बीतते गए और अब ये अनजान बुजुर्ग महिला सभी के लिए बन गयी ( भारतीय अम्मा ) अब उर्सला का सारा नर्सिंग स्टाफ, डॉक्टर “भारतीय अम्मा” को अपना परिवार मानने लगा था, लेकिन अचानक से 15 साल के लंबे इंतजार के बाद 2025 में भारतीय अम्मा का परिवार उनसे मिलने आ गया जिसके बाद भारतीय अम्मा आज अस्पताल छोड़कर जाने को मजबूर दिखी, और उनकी आंखें नम नज़र आई । साथ ही साथ जिन जिन व्यक्तियों ने ये दास्तान सुनी वो हर एक आँख नम सी दिखी ।

बीते 15 वर्ष से अपने परिवार से बिछड़कर रह रही थी बुजुर्ग महिला

बताते चले मानसिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से अम्मा पिछले 15 वर्षों से तेलंगाना में मौजूद अपने घर-परिवार से बिछड़ी हुई थीं । ऐसे में मानसिकता में अस्वस्थता की वजह से अम्मा अपना नाम-पता नहीं बता पाती थीं। डॉक्टर्स बताते है कि बीते तीन साल पहले कानपुर के रेलबाजार थाने की पुलिस द्वारा उन्हें गंभीर और बीमार हालत में अस्पताल में लाया गया था, उसके बाद से अम्मा इस उर्सला अस्पताल की होकर रह गई थीं।

लेकिन उर्सला अस्पताल की नर्सिंग टीम ने उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा। तीन साल तक नर्सों ने अम्मा की एक मां की तरह सेवा की, सुबह नहलाना, कपड़े धोना, अपने हाथों से खाना खिलाना, दवाई देना, त्योहारों पर नए कपड़े पहनाना, पूजा में साथ बैठाना, रात-रात भर ड्यूटी करते हुए उनके साथ बातें करना। अम्मा के लिए अस्पताल का वार्ड ही उनका घर बन गया था। लेकिन कहीं न कहीं इस बीच अम्मा अपने परिवार को याद कर कर के कभी कभी अचानक रोने लगती थी । ये बात कहीं न कहीं नर्सिंग स्टाफ को भी विचलित करती थी । ऐसे में स्टाफ़ तय किया कि अम्मा को उनके परिवार से मिलवाने के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगी ।

शुरवात में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा लेक़िन उर्सला अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ व डॉक्टर्स ने हार नहीं मानी। अम्मा को परिवार से मिलवाने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट, पुलिस की मदद, पुरानी तस्वीरें वायरल करना, गांव-गांव खोजबीन करना शुरू कर दिया, जिसके बाद कहते है न किसी भी चीज को आप शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे आपसे मिलने में लग जाती है, यहां भी ऐसा ही कुछ हुआ । अस्पताल के CMS डॉ बालचंद्र ने बताया कि अम्मा की भाषा तेलंगाना की होने की वजह से उनकी मदद करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था । लेकिन फिर अचानक पता चला कि तेलंगाना की ही रहने वाली एक डॉक्टर भारद्वाज उर्सला अस्पताल में आयी और उसने अम्मा की भाषा को समझा । जिसके बाद समस्या का सही समाधान निकला ।

उस डॉक्टर की मदद से तेलंगाना में संपर्क किया गया जहां पता चला कि इस महिला की वर्ष 2010 में गुमशुदगी दर्ज कराई गई थी जिसके बाद से ये लापता थी । 15 वर्षों का इतना लंबा समय होने की वजह से परिवार ने भी मान लिया था कि शायद उनकी अम्मा अब इस दुनिया मे नही है । लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था । जैसे ही तेलंगाना पुलिस और वहां के कुछ लोगों की मदद से अम्मा की पहचान हुई तो अम्मा का असल परिवार उन्हें लेने के लिए आ गया । जिसके बाद इतने वर्षों से भाषा की बनी दीवार टूट गयी । अम्मा अपने असल परिवार के साथ जाने के लिए तैयार हो गयी । और आज जब अम्मा को विदा करने का वक्त आया तो पूरा नर्सिंग स्टाफ़, वार्ड स्टाफ़ रो पड़ा। नर्सें उन्हें गले लगाकर रोती रहीं, जैसे अपनी सगी मां को विदा कर रही हों। जब अम्मा अपने बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों से मिलीं तो घरवालो में भी खुशी के आंसू नहीं रुके।

अस्पताल की सिस्टर प्रिया, नर्स से बात करने पर बताया “अम्मा हमारे लिए मरीज नहीं, हमारी मां थीं। तीन साल हमने उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत पूरी की। आज वो अपने घर जा रही हैं, हमें वही खुशी है जो अपनी मां को ससुराल विदा करते वक्त होती है। अस्पताल के डॉ. बाल चंद्र, जो कि सीएमएस है उर्सला अस्पताल के उन्होंने कहा कि “ये हमारे अस्पताल की टीम वर्क की सबसे बड़ी मिसाल है। हमने सिर्फ इलाज नहीं किया, एक परिवार को फिर से जोड़ा है। अम्मा की मुस्कान ही हमारा सबसे बड़ा अवॉर्ड है।

अपनी मां को स्वस्थ हालातों में पाकर उनके असली बेटा बेहद भावुक स्वर में बोला “हमने उम्मीद छोड़ दी थी… लेकिन इन बहनों-डॉक्टर्स ने हमारी मां को जिंदा लौटाया। ये लोग भगवान का रूप हैं। इस मानवीय संवेदना और प्यार के बाद 15 साल का लंबा इंतजार और तीन साल की ममता भरी सेवा के बाद आज एक बिछड़न की दास्तान खत्म हुई। कानपुर का उर्सला अस्पताल आज पूरे देश के लिए इंसानियत, ममता और मानवीयता की सबसे मिसाल बन गया है। और अम्मा को पुलिस की लिखापढ़ी में उनके परिवार को सुपुर्द कर दिया गया ।

कानपुर से संवाददाता अनुराग श्रीवास्तव की रिपोर्ट

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