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ब्राह्मण विधायकों के ‘कुटुम्ब’ से भाजपा में मची खलबली, प्रदेशाध्यक्ष ने दी चेतावनी

जयशंकर प्रसाद शुक्ल (वरिष्ठ पत्रकार)

लखनऊ। अरे बाबा…! भारतीय जनता पार्टी गुड़ खाती है लेकिन गुलगुला से परहेज़ करती है। यानि कि भाजपा पर यह कहावत खूब सटीक बैठती है कि हांथी के दांत दिखाने के और खाने के और हैं‌।यूपी में विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के दरम्यान बंद कमरे में 50 ब्राह्मण विधायकों ने बैठकी की। जिससे भाजपा में खलबली मच गई। कुशीनगर के भाजपा विधायक पी एन पाठक (पंचानंद पाठक) की पत्नी के जन्म दिवस के नाम पर उनके लखनऊ आवास पर बैठक हुई। इसमें पूर्वांचल और बुंदेलखंड के 45 से 50 ब्राह्मण विधायक शामिल हुए। विधायकों को लिट्टी चोखा और मंगलवार व्रत का फलाहार परोसा गया। पत्रकार से विधायक बने डॉक्टर शलभ मणि त्रिपाठी भी बैठक में पहुंचे मिर्जापुर विधायक रत्नाकर मिश्रा और एमएलसी उमेश द्विवेदी की मुख्य भूमिका रही है।

बैठक में कहा गया कि अलग-अलग जाति की खांची में कई जातियां तो शक्तिशाली हो गईं, लेकिन ब्राह्मण पिछड़ गए हैं। जाति की राजनीति में ब्राह्मणों की आवाज दबती जा रही है। उन्हें अनसुना कर दिया गया है। ब्राह्मणों के मुद्दों को उठाने जोर-शोर से उठाने के लिए यह जुटान हुई है।
इन विधायकों का मानना है कि उनके समाज से डिप्टी सीएम तो हैं लेकिन उनको ताकत नहीं दिया गया। ब्राह्मण विधायकों ने इसे सहभोज नाम दिया है। यूपी विधानसभा में इस समय 52 ब्राह्मण विधायक हैं, इनमें 46 भाजपा के हैं।

वर्ष 2025 विधानमंडल के मानसून सत्र में क्षत्रिय समाज के ठाकुर विधायकों ने कुटुंब परिवार के नाम पर बैठक कर तेवर दिखाए थे। लखनऊ में 11अगस्त को यूपी विधानमंडल का मानसून सत्र का पहला दिन था। सुबह विपक्ष ने प्रदर्शन किया तो सत्ता पक्ष ने पलटवार, लेकिन शाम ढलते ही लखनऊ के फाइव स्टार होटल में भाजपा के क्षत्रिय विधायकों की बैठक हुई। इसमें सपा के दो क्षत्रिय बागी विधायक भी शामिल हुए।
किसी ने इसे बर्थडे पार्टी बताया तो किसी ने कहा यह ठाकुर रामवीर की जीत का जश्न है। बहरहाल, होटल क्लार्क अवध में हुई बैठक को ‘कुटुंब परिवार’ नाम दिया गया। इसमें यूपी में कुल 49 ठाकुर विधायकों में से करीब 40 विधायक शामिल हुए थे।

एमएलसी जयपाल सिंह व्यस्त और मुरादाबाद से विधायक ठाकुर रामवीर सिंह की तरफ से बैठक में भाजपा और सपा के क्षत्रिय विधायकों को आमंत्रित किया गया था। दूसरी जातियों के विधायक भी बुलाए गए थे। मगर, उनकी मौजूदगी कम थी। उनमें भी ऐसे विधायक शामिल थे, जो भाजपा सरकार खेमे के करीबी हैं। हम बताते चलें कि इससे पहले अयोध्या में कुर्मी समाज की बैठक हुई थी। जिसमें भाजपा के वर्तमान जलशक्ति मंत्री एवं पूर्व प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह और केन्द्रीय राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल और लोध समाज की लखनऊ के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में बैठक हुई थी। भाजपा ने तब कोई फ़रमान जारी नही किया था।

भाजपा खुद भी जातीयता की राजनीति की समर्थक है। फिर भी ब्राह्मण विधायकों की एकजुटता अखर रही है। और तो और भाजपा ने तो जातीयताओं के आधार पर अपने यहां मोर्चा बना रखा है। अब ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर भाजपा को मिर्चा लग रहा है। जबकि जातीयता के मोर्चा का मिर्चा भाजपा ने ही बोया है।भाजपा ने तो विभिन्न जातीय समाज के दलों की बनी पार्टियों को मंत्रिमंडल में शामिल कर रखा है। यह तो वही बात हो गई कि गुड़ खाओ और गुलगुला से परहेज़ करो।

बैठक में सीएम योगी के पूर्व मीडिया सलाहकार एवं देवरिया विधायक डॉक्टर शलभ मणि त्रिपाठी, पीएम नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव रहे नृपेंद्र मिश्रा के बेटे और एमएलसी साकेत मिश्रा, नौतनवां विधायक ऋषि त्रिपाठी, तरबगंज से विधायक प्रेमनारायण पांडेय, मिर्जापुर से विधायक रत्नाकर मिश्रा, बांदा विधायक प्रकाश द्विवेदी, बदलापुर से भाजपा विधायक रमेश मिश्रा, खलीलाबाद से विधायक अंकुर राज तिवारी और मेहनौन से भाजपा विनय द्विवेदी सहित अन्य विधायक बैठक में शामिल हुए।

एमएलसी उमेश द्विवेदी, धर्मेंद्र सिंह और बाबूलाल तिवारी भी बैठक में पहुंचे। ज्ञानपुर से विधायक विपुल दुबे, महोबा से विधायक राकेश गोस्वामी, विधायक विनोद चतुर्वेदी, संजय शर्मा, विवेकानंद पांडेय, अनिल त्रिपाठी, अंकुर राज तिवारी, सुभाष त्रिपाठी, अनिल पाराशर, कैलाशनाथ शुक्ला, प्रेमनारायण पाण्डेय, ज्ञान तिवारी और सुनील दत्त द्विवेदी भी मौजूद रहे।

इन ख़ास मुद्दों पर हुई चर्चा संघ, सरकार और संगठन में सुनवाई नहीं ब्राह्मण विधायकों की बैठक में चर्चा हुई कि समाज के लोगों की आरएसएस, भाजपा और सरकार में कोई सुनने वाला नहीं है। संघ, सरकार और संगठन में ब्राह्मण समाज का ऐसा कोई बड़ा या जिम्मेदार पदाधिकारी नहीं है जिसके पास जाकर समाज के लोग अपनी बात रख सकें। समाज के विधायकों, सांसदों और नेताओं की समस्या सुनने वाला कोई नहीं है। एक जाति विशेष के लोगों को खास तवज्जो दी जाती है, उस जाति के लोगों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने का काम किया था।

जबकि ब्राह्मणों की आबादी उनसे ज्यादा है और समाज हमेशा भाजपा के साथ रहा है। इसी बैठक में यह भी चर्चा हुई कि संगठन और सरकार में लगातार ब्राह्मणों का कद घटाया जा रहा है। भाजपा में भी ब्राह्मण पदाधिकारियों की संख्या कम की गई है। डिप्टी सीएम को ताकत नहीं बैठक में मौजूद ब्राह्मण विधायकों का मानना था कि पार्टी ने समाज के विधायक ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाया है। लेकिन सरकार ने उन्हें ताकत नहीं दी है।

सुनील भराला नामांकन दाखिल नहीं हो सका था भाजपा के ब्राह्मण नेता सुनील भराला भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में नामांकन दाखिल करने पहुंच गए थे। उनके पास पर्याप्त संख्या में ब्राह्मण और अन्य जातियों के प्रस्तावक भी थे। जानकारों का मानना है कि भराला ने ब्राह्मण समाज को मौका नहीं मिलने से नाराज होने के बाद ही नामांकन दाखिल करने का निर्णय किया था। पार्टी के कई ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें समर्थन भी दिया था। लेकिन ऐन वक्त पर पार्टी नेतृत्व के दखल के कारण उन्होंने नामांकन दाखिल नहीं किया।

पूर्वांचल के विधायक डॉ साहब की अगुवाई में जनवरी में ब्राह्मण सांसदों की बैठक होगी। जनवरी में फिर होगी ब्राह्मण विधायकों की बैठक ब्राह्मणों की एकजुटता के लिए समाज के विधायकों की बैठक जनवरी में एक बार फिर आहूत होगी। अगली बैठक में ब्राह्मण सांसदों को भी लेकर समाज के राजनीतिक और सामाजिक हित के लिए दिशा तय की जाएगी। क्यों ब्राह्मण विधायकों ने बैठक करने का लिया निर्णय

ब्राह्मणों में बढ़ रही है भाजपा से नाराजगी

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ब्राह्मणों में भाजपा से नाराजगी और असंतोष बढ़ता जा रहा है। ब्राह्मण समाज भाजपा का परंपरागत वोट बैंक रहा है। जब यूपी में भाजपा तीसरे चौथे नंबर की पार्टी थी, तब भी समाज का अधिकांश वोट भाजपा को मिलता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों से समाज उपेक्षित महसूस कर रहा है। समाज के विधायक भी संगठन और सरकार में उनकी सुनवाई नहीं होने की शिकायतें करते रहे हैं। इटावा कांड के बाद ज्यादा मुखर। ब्राह्मणों में इटावा कथावाचक चोटी कांड के बाद गुस्सा और बढ़ा है।

सूबे में ब्राह्मण बनाम यादव संघर्ष ने जोर पकड़ा तो कोई ब्राह्मण नेता वहां नहीं पहुंचा। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कथावाचक और उनके सहयोगी को लखनऊ बुलाकर सम्मानित किया था। सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ कैंपेनिंग भी हुई। ब्राह्मण एकता नाम के फेसबुक अकाउंट से एक पोस्ट लिखी गई। जिसमें कहा गया है कि यूपी के 51 ब्राह्मण विधायकों पर थू है, कोई भी विधायक इटावा में ब्राह्मण समाज के लिए खड़ा नहीं हुआ। वहीं, परशुराम सेना संघ ने आरोप लगाया कि ब्राह्मणों को सभी पार्टियां कमजोर करने में जुटी हुई हैं। 2027 में सभी को सबक सिखाया जाएगा। ब्राह्मण वोट बैंक यूपी के हर जिले में ब्राह्मण वोट बैंक यूपी के लगभग हर जिले में है।

हालांकि, पूर्वांचल यानी सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, अंबेडकरनगर, फैजाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, गाजीपुर, गोंडा, बस्ती, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर जैसे जिले ब्राह्मण वोट बैंक का गढ़ माने जाते हैं। मध्य यूपी यानी कानपुर, रायबरेली, फर्रुखाबाद, कन्नौज, उन्नाव, लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, हरदोई, इलाहाबाद, अमेठी आदि जिले भी इस वोट बैंक का गढ़ हैं। इसी तरह बुंदेलखंड यानी हमीरपुर, हरदोई, जालौन, झांसी, चित्रकूट, ललितपुर, बांदा आदि इलाके ब्राह्मण वोटर्स का केंद्र हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि ब्राह्मण वोटर्स की लगभग 30 जिलों में महत्वपूर्ण भूमिका है। अगर हम एक जिले की औसतन पांच विधानसभा मान लें तो इनकी संख्या 150 तक पहुंच जाती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 89 फीसदी वोट मिले भाजपा को 2022 यूपी चुनाव में 89% ब्राह्मणों ने दिए वोट दिए थे। ब्राह्मण सियासत के जानकार कहते हैं ब्राह्मण वोकल होता है और अपने आसपास के दस वोटरों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सभी पार्टियां ब्राह्मणों के ताकत को समझती हैं। भले ही ब्राह्मणों की संख्या यूपी में 11-12 प्रतिशत हो, लेकिन दमदारी से अपनी बात रखने की वजह से वह जहां भी रहे हैं, प्रभावशाली रहते हैं। यही वजह है कि आजादी के बाद से 1989 तक यूपी को छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री मिले।

दिवंगत पूर्व नेता प्रतिपक्ष एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन ने विधानसभा में सत्र के दरम्यान सदन में ब्राह्मणों पर तंज कसते हुए कहा था कि ब्राह्मण बिन पेंदी के लोटा होते हैं। यह कहीं भी किसी भी समय लुढ़क जाते हैं। यह किसी के नही होते हैं उस वक्त कांग्रेस विधान मंडल के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व विधायक (वर्तमान में राजस्थान से राज्य सभा सांसद) प्रमोद तिवारी ने लालजी टंडन के इस तंज पर जवाब देते हुए सदन में कहा था कि टंडन जी आप यह तो मानेंगे न कि ब्राह्मण जिधर होता है, उसी की सरकार बनती है।

श्री तिवारी ने श्री टंडन को याद दिलाते हुए कहा कि …जब ब्राह्मण कांग्रेस में था, तब सरकार हमारी थी।

…जब ब्राह्मण भाजपा में गया तब सरकार भाजपा की बनी।
…जब ब्राह्मण बसपा में गया तब सरकार बसपा की रही।
…जब ब्राह्मण सपा में गया तब सरकार सपा की हुई।

श्री तिवारी ने कहा जब-जब ब्राह्मण जिस दल के साथ रहा उत्तर प्रदेश में सरकार उसी दल की बनी है। 2007 में ब्राह्मण दलित गठजोड़ से ही बसपा पूर्ण बहुमत में सत्ता में आ पाई थी। उस वक्त बीएसपी प्रमुख मायावती ने ब्राह्मण और दलित की सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला बनाया था। 80 से 90 फीसदी तक ब्राह्मण बसपा के साथ जुड़ गए थे। दलितों की पार्टी कही जाने वाली बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा को दूसरे नंबर का दर्जा दे दिया गया। आरोप लगते हैं कि 2009 में बीएसपी सरकार में तमाम लोगों पर एससी-एसटी के मुकदमे दर्ज हुए, जिनमें ब्राह्मण नाराज हो गए और वह 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ आ गए। 2017 में उन्होंने बीजेपी का साथ दिया और उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में मदद की। विधानसभा में बीजेपी के 46 ब्राह्मण विधायक जीतकर पहुंचे। आखिर ब्राह्मणों की एकजुटता से संघ, संगठन और सरकार बेचैन क्यों है?यह एक यक्ष प्रश्न है कि क्या अन्य जातियों के समाज को भी चुनौती देते हुए चिंता बढ़ा दी है?
यहां यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि भाजपाई गुलगुला से परहेज़ करेंगे लेकिन गुड़ खाएंगे।

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