रिपोर्ट – मनोज तिवारी हरदोई
हरदोई जिले के संडीला कस्बे से सामने आया एक मामला न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करता है, बल्कि पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। हल्दीराम फैक्ट्री में काम करने वाले 34 वर्षीय मजदूर शिवदेश की आत्महत्या अब केवल एक सुसाइड केस नहीं रही, बल्कि यह सिस्टम की संवेदनहीनता और “आपराधिक चुप्पी” का प्रतीक बन चुकी है।
29 दिसंबर 2025 को शिवदेश ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। मूल रूप से फर्रुखाबाद जनपद के एक गांव का रहने वाला शिवदेश रोजगार की उम्मीद में तीन महीने पहले संडीला आया था, लेकिन यहां उसका सामना कथित तौर पर ऐसे लोगों से हुआ, जिन्होंने उसकी जिंदगी को नरक बना दिया।
सुसाइड नोट ने खोली दरिंदगी की परतें
शिवदेश के अंतिम संस्कार के दो दिन बाद उसकी जैकेट से मिले सुसाइड नोट ने पूरे मामले को सनसनीखेज मोड़ दे दिया। नोट में ठेकेदार विवेक मिश्रा और उसके पांच साथियों आलोक, बृजेश, लवकुश, गणेश और डी.के. भाई पर गंभीर आरोप लगाए गए। मृतक ने लिखा कि 21 दिसंबर को आरोपियों ने उसे जबरन शराब पिलाई, नशीला इंजेक्शन लगाया और उसके साथ अप्राकृतिक कृत्य किया।
यह आरोप केवल अपराध नहीं, बल्कि एक गरीब मजदूर की अस्मिता, सम्मान और मानसिक स्थिति को तोड़ने वाली बर्बरता की कहानी बयां करते हैं।
मौत से पहले भी लगाई थी गुहार, फिर भी रही खामोशी
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू पुलिस की भूमिका को लेकर है। परिजनों के अनुसार शिवदेश ने मरने से पहले न्याय पाने के लिए कई बार गुहार लगाई थी। 24 दिसंबर को उसने स्थानीय पुलिस को और 26 दिसंबर को उच्चाधिकारियों को लिखित शिकायत दी थी, जिसमें उसने कुकर्म, मारपीट और जान से मारने की धमकी का स्पष्ट उल्लेख किया था। उसने स्थानीय पुलिस पर आरोपियों से मिलीभगत का आरोप भी लगाया था।
परिजनों का दावा है कि शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। उल्टा, शिकायत के बाद आरोपियों ने उसे दोबारा पकड़ा और बेरहमी से पीटा। लोकलाज, बदनामी का डर और सिस्टम की बेरुखी ने उसे अंदर से तोड़ दिया और आखिरकार उसने आत्महत्या कर ली।
मौत के बाद सक्रिय हुई पुलिस, उठ रहे बड़े सवाल
मौत के बाद संडीला पुलिस ने बीएनएस की धारा 108 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। लेकिन सवाल यह है कि जब पीड़ित जिंदा था और लगातार मदद की गुहार लगा रहा था, तब पुलिस क्यों खामोश रही?
यह एफआईआर इंसाफ की जीत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की हार मानी जा रही है, जिसने समय रहते एक मजदूर की चीखें नहीं सुनीं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच केवल ठेकेदार और उसके साथियों तक सीमित रहेगी या फिर उन पुलिसकर्मियों की भूमिका की भी जांच होगी, जिनकी चुप्पी ने एक इंसान को फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया।