लेखक:
डॉ. जयशंकर प्रसाद शुक्ल
(वरिष्ठ पत्रकार)
लखनऊ।
प्रयागराज। माघ मास में संगम तट पर लगे माघ मेला में कल्पवासी एक माह तक कल्पवास करते हैं। हम भी दो दिवस के सपरिवार कल्पवासी हुए। विशेष पर्व अचला सप्तमी के पुण्य स्नान पर संगम में सपरिवार डुबकी लगाई थी। वरिष्ठ पत्रकार व कल्पवासी रामचंद्र पांडे “रामू भाई” के आतिथ्य में दो दिन 24-25 जनवरी को संगम तट पर दो दिवसीय प्रवास रहा। हम सब ने महसूस किया कि संगम तट पर माघ मास में दो दिवस के सपरिवार कल्पवासी हुए। रामू भाई से पौराणिक माघ मेला व मेले में आए कल्पवासियों एवं माघ मेला क्षेत्र के ऐतिहासिक,सांस्कृतिक पौराणिक,धार्मिक विषयों पर अनेकानेक विस्तृत चर्चाएं हुईं।
तीर्थराज प्रयागराज में माघ पूर्णिमा को कल्पवासियों का संगम तट पर अंतिम स्नान होता है। तीर्थराज प्रयागराज की संगम नगरी में संगम तट पर कल्पवासी अपनी कायाकल्प का संकल्प लेकर कल्पवासी अपने-अपने घर की ओर प्रस्थान करते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार 14 या 15 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन माघ महीने में यह मेला आयोजित होता है। जिसे माघ मेला कहते हैं। यह भारत के सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों में मनाया जाता है। नदी या सागर स्नान इसका मुख्य उद्देश्य होता है। माघ पूर्णिमा पर स्नान का विशेष महत्व है, लेकिन पूरे मास में कभी भी किया जा सकता है।
यह स्थान हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है; श्रद्धालु माघ महीने (जनवरी-फरवरी) में संगम में स्नान कर पापों से मुक्ति, मोक्ष और आत्मिक शुद्धि प्राप्त करने की धार्मिक मान्यता रखते हैं, जिसे संगम के अमृत समान जल और कल्पवास के माध्यम से प्राप्त किया जाता है, साथ ही यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का संगम है जो सृष्टि की शुरुआत से जुड़ा है।
धार्मिक मान्यता
पाप मुक्ति और मोक्ष: माना जाता है कि माघ महीने में संगम में स्नान करने से जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) मिलती है और पिछले जन्मों के पाप धुल जाते हैं।
अमृत की बूंदें: पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूंदें तीर्थराज प्रयागराज के संगम पर गिरी थीं, जिससे यह स्थान अमृतमय हो गया।
तीर्थराज प्रयाग: ब्रह्मा जी ने इस स्थान को ‘तीर्थराज’ (सभी तीर्थों का राजा) कहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है।
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व:
सामूहिक साधना: यह लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक सामूहिक तपस्या, अनुशासन और आत्म-सुधार का मंच है, जहां वे स्वयं को फिर से गढ़ते हैं।
कल्पवास: पूरे माघ महीने में साधु-संत और गृहस्थ कल्पवास करते हैं, जिससे उनका कायाकल्प होता है और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
धार्मिक अभ्यास: यह केवल धर्म का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का अभ्यास है, जहाँ त्याग और तपस्या का महत्व है।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य पहलू (मान्यताओं के अनुसार):
गंगा जल के गुण: ऐसी मान्यता है कि माघ महीने में गंगा जल में विशेष खनिज और औषधीय गुण आ जाते हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाते हैं और त्वचा रोगों में लाभकारी होते हैं।
इच्छाशक्ति में वृद्धि: कड़ाके की ठंड में ठंडे पानी से स्नान करना मानसिक दृढ़ता और इच्छाशक्ति को मजबूत करता है।
माघ मेला धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक शुद्धि, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सदियों पुरानी परंपराओं का एक अनूठा संगम है, जो हर साल प्रयागराज में लाखों लोगों को आकर्षित करता है।
पाप मुक्ति: यह जन्म-जन्मांतर के दोषों और पापों का नाश करता है, जिससे व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है।
आध्यात्मिक उन्नति: इससे आत्मिक बल, आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, जिससे मन शांत रहता है और नकारात्मकता दूर होती है।
उत्तम स्वास्थ्य: यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, रोगों का नाश करता है और शरीर को निरोगी बनाता है।
सुख-समृद्धि: आर्थिक दिक्कतें दूर होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, साथ ही अकाल मृत्यु का भय भी टलता है।
अक्षय पुण्य: माघ पूर्णिमा पर किया गया स्नान, दान, जप आदि अक्षय (कभी खत्म न होने वाला) पुण्य प्रदान करता है, जो हजारों यज्ञों के बराबर माना जाता है।
मनोकामना पूर्ति: यह सभी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करता है, बाधाएं दूर करता है और सफलता सुनिश्चित करता है।
कैसे करें माघ स्नान:
ब्रह्म मुहूर्त में किसी पवित्र नदी (गंगा, यमुना आदि) या सरोवर (जैसे प्रयागराज) में स्नान करें।
यदि संभव न हो, तो घर के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें, भगवान विष्णु की पूजा करें और दान-पुण्य करें, खासकर तिल, कम्बल, अन्न आदि का दान करें।