राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार (17 फरवरी) को लखनऊ में आयोजित एक सामाजिक सद्भाव बैठक में कई समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए। यह कार्यक्रम निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित हुआ था।
बैठक को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि “हमको किसी से खतरा नहीं है, लेकिन सावधान रहना जरूरी है।” उन्होंने हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए परिवारों को कम से कम तीन बच्चों के लिए प्रेरित करने की बात कही। उनके अनुसार, वैज्ञानिकों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जिस समाज में औसतन तीन से कम बच्चे होते हैं, वह भविष्य में समाप्ति की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने नवविवाहित दंपतियों को परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी समझाने पर जोर दिया।
मतांतरण के मुद्दे पर उन्होंने कथित तौर पर लालच और जबरदस्ती से हो रहे धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने की आवश्यकता बताई। साथ ही “घर वापसी” अभियान को तेज करने की बात कही और कहा कि जो लोग हिंदू धर्म में लौटते हैं, उनकी जिम्मेदारी समाज को उठानी चाहिए। घुसपैठ के मुद्दे पर उन्होंने “डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट” की नीति अपनाने की बात कही और ऐसे लोगों को रोजगार न देने का सुझाव दिया।
सामाजिक एकता पर जोर देते हुए भागवत ने कहा कि सद्भाव के अभाव में भेदभाव पनपता है। उन्होंने कहा कि सभी लोग एक ही देश और मातृभूमि के पुत्र हैं और सनातन विचारधारा मूलतः सद्भाव का संदेश देती है। उनके अनुसार, विरोधियों को समाप्त करना समाधान नहीं है, बल्कि समन्वय और आपसी समझ से ही समाज आगे बढ़ सकता है।
यूजीसी गाइडलाइन से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि कानून का पालन सभी को करना चाहिए। यदि कोई कानून गलत है तो उसे बदलने के संवैधानिक उपाय मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जाति समाज में संघर्ष का कारण नहीं बननी चाहिए और जो लोग सामाजिक रूप से पीछे रह गए हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए समाज को झुककर सहयोग करना होगा।