नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष Om Birla गुरुवार को फिर से सदन की कार्यवाही में शामिल हुए। उनके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के ध्वनिमत से खारिज होने के एक दिन बाद उन्होंने लोकसभा में लौटकर सदस्यों को संबोधित किया और अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को तथ्यों के साथ खारिज कर दिया। सदन को संबोधित करते हुए ओम बिरला ने कहा कि स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में तीसरी बार लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि सदन का हर सदस्य नियमों और प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर अपने विचार रख सके।
140 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है सदन
ओम बिरला ने कहा कि लोकसभा में उन्हें हटाने के प्रस्ताव पर करीब 12 घंटे तक चर्चा हुई, जिसमें विपक्ष ने निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए और यह भी कहा कि सदन में उसकी आवाज दबाई गई। उन्होंने कहा कि लोकसभा देश के 140 करोड़ लोगों की इच्छा और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने हमेशा कोशिश की है कि हर सदस्य को नियमों के तहत अपनी बात रखने का अवसर मिले और जो सदस्य कार्यवाही में भाग लेने से झिझकते हैं उन्हें भी प्रोत्साहित किया जाए।
सदन के विश्वास के लिए आभारी हूं
स्पीकर ने कहा कि उन्होंने हमेशा प्रयास किया है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्ष और नियमों के अनुसार चले। जिस दिन विपक्ष ने उन्हें पद से हटाने का नोटिस दिया, उस दिन वह कार्यवाही से दूर रहे। उन्होंने कहा कि बहस के दौरान जिन्होंने उनका समर्थन किया या आलोचनात्मक सुझाव दिए, वे सभी इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष की कुर्सी किसी एक व्यक्ति की नहीं होती, बल्कि यह सदन की गरिमा और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। सदन ने जो विश्वास व्यक्त किया है, उसके लिए वह आभारी हैं।
नियमों से ऊपर कोई नहीं
ओम बिरला ने नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi को बोलने से रोकने के आरोपों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सदन में हर सदस्य को नियमों के अनुसार ही बोलने का अधिकार है और लोकसभा में कोई भी व्यक्ति नियमों से ऊपर नहीं है। यह नियम प्रधानमंत्री और मंत्रियों पर भी समान रूप से लागू होते हैं, जिन्हें बयान देने से पहले सदन के नियमों के तहत नोटिस देना पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि कुछ सदस्यों का मानना था कि नेता प्रतिपक्ष सदन से ऊपर हैं और किसी भी विषय पर बोल सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई विशेषाधिकार किसी को प्राप्त नहीं है। सभी को सदन द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार ही अपनी बात रखने का अधिकार है और वही नियम उन्हें विरासत में मिले हैं।