रिपोर्ट – रीतेश चौहान
बदायूं: एक दिसंबर को सड़क हादसे में घायल हुए धर्मपाल के परिवार ने शायद यह नहीं सोचा था कि बेटे के इलाज से ज्यादा दर्दनाक जंग उन्हें उसकी लाश पाने के लिए लड़नी पड़ेगी। हादसे के 14 दिन बाद धर्मपाल की मौत हो गई, लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
बदायूं के दातागंज कोतवाली क्षेत्र के नगरिया गांव निवासी धर्मपाल को हादसे के बाद पहले सरकारी अस्पताल ले जाया गया। परिजनों का आरोप है कि वहां समुचित इलाज नहीं मिला, जिसके बाद वे उसे बरेली के निजी ओमेगा अस्पताल लेकर पहुंचे। अस्पताल में इलाज के नाम पर पहले ही तीन लाख रुपये जमा करा लिए गए। 14 दिन तक इलाज चला और बिल बढ़कर 3 लाख 10 हजार रुपये हो गया।
परिजनों का कहना है कि बेटे की मौत के बाद अस्पताल प्रबंधन ने साफ कह दिया कि पूरा बकाया जमा करने के बाद ही शव सौंपा जाएगा। मजबूर पिता ने गिड़गिड़ाकर विनती की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बिना बेटे का शव लिए वह गांव लौट आया।
बेटे की लाश पाने के लिए पिता ने डेढ़ लाख रुपये में अपना घर गिरवी रख दिया। इसके बावजूद रकम पूरी नहीं हुई तो लोगों से उधार लिया और सड़क पर भीख तक मांगनी पड़ी। तमाम जद्दोजहद के बाद पिता 2 लाख 80 हजार रुपये जुटाकर अस्पताल पहुंचा, लेकिन अस्पताल ने 30 हजार रुपये और मांगे।आखिरकार पिता ने पुलिस से मदद की गुहार लगाई। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद ही धर्मपाल का शव परिजनों को सौंपा गया और गांव लाकर अंतिम संस्कार किया जा सका।
इस घटना ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी है कि क्या इंसान की जिंदगी और मौत अब सिर्फ बिल और भुगतान तक सीमित रह गई है। जिस पिता के कंधों पर बेटे की अर्थी उठनी थी, उसे पहले बेटे की लाश पाने के लिए सड़कों पर हाथ फैलाने पड़े। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर देने के लिए काफी है।