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फ्रेंड विद बेनिफिट: सुख का भ्रम और सामाजिक संकट

नोएडा: सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रपाल प्रजापति जी का नीरज गोयल द्वारा साक्षात्कार

युवाओं में मित्रता के संबंध को कैसे देखते हैं

आज के डिजिटल और आधुनिक युग में किशोरों और युवाओं में “फ्रेंड विद बेनिफिट” जैसी अवधारणाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इसमें दोस्ती के साथ शारीरिक संबंध तो होते हैं, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव, सामाजिक जिम्मेदारी और भविष्य की सोच नहीं होती। सोशल मीडिया, फिल्मों, वेब सीरीज़ और दिखावे की संस्कृति ने रिश्तों को अस्थायी और उपभोग की वस्तु बना दिया है। किशोरावस्था भावनात्मक रूप से कमजोर समय होता है, जिसमें बच्चे आसानी से गलत प्रभाव में आ जाते हैं।

बच्चों के जीवन में भटकाव में माता-पिता की क्या भूमिका है

माता-पिता की व्यस्तता, संवाद की कमी और सही मार्गदर्शन के अभाव में कई बच्चे ऐसे रिश्तों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, जो आगे चलकर उनके जीवन के लिए नुकसानदायक सिद्ध होते हैं। इस विषय पर प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय संस्थाओं ने गंभीर चिंता जताई है: World Health Organization (WHO), UNICEF, Ministry of Health and Family Welfare। इन संस्थाओं की रिपोर्टें किशोर स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और सामाजिक सुरक्षा पर आधारित हैं।

युवाओं में यौन रोगों के प्रति जागरूकता के अभाव से होने वाले रोग कैसे कम होंगे

WHO के अनुसार: असुरक्षित यौन संबंध किशोर गर्भधारण और यौन रोगों का प्रमुख कारण हैं। HIV/AIDS और STD का खतरा किशोरों में अधिक होता है। सही यौन शिक्षा से जोखिम 30–40% तक कम हो सकता है।

डिजिटल युग और अकेलेपन की क्या भूमिका है

UNICEF के अनुसार: जिन बच्चों को माता-पिता का भावनात्मक सहयोग नहीं मिलता, उनमें जोखिमपूर्ण व्यवहार 50% तक अधिक पाया जाता है। डिजिटल लत और अकेलापन गलत रिश्तों को बढ़ावा देता है।
भारत सरकार के अनुसार: बड़ी संख्या में किशोर यौन स्वास्थ्य की सही जानकारी नहीं रखते। कम उम्र में गर्भधारण से माँ और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ता है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं।
ऐसे रिश्तों में रहने वाले युवाओं में डिप्रेशन और चिंता 30–35% अधिक पाई जाती है।
आत्मसम्मान में गिरावट सामान्य समस्या है।

फ्रेंड विद बेनिफिट संस्कृति का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है:

(क) पारिवारिक प्रभाव – माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी बढ़ती है। भरोसा कमजोर होता है। पारिवारिक संस्कार घटते हैं।
(ख) सामाजिक प्रभाव – विवाह संस्था कमजोर होती है। रिश्तों में स्थायित्व कम होता है।
सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है।
(ग) मानसिक प्रभाव – अकेलापन, अवसाद, आत्महत्या के विचार, भावनात्मक असुरक्षा
(घ) स्वास्थ्य प्रभाव – अनचाहा गर्भ, यौन रोग, असुरक्षित गर्भपात, भविष्य में प्रजनन समस्याएँ
इन सभी प्रभावों से समाज धीरे-धीरे असंतुलित और कमजोर बनता जा रहा है।

युवाओं को डिजिटल युग में होने वाली इन समस्याओं के समाधान के क्या उपाय हैं

माता-पिता के लिए – बच्चों से रोज संवाद करें। भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखें। गतिविधियों पर नजर रखें। सीमाएं तय करें। भरोसे का वातावरण बनाएं।
स्कूल और शिक्षा व्यवस्था- नैतिक शिक्षा अनिवार्य करें। जीवन कौशल प्रशिक्षण दें। सही यौन शिक्षा दें। काउंसलिंग की व्यवस्था करें। डिजिटल साक्षरता सिखाएं।
किशोरों के लिए- आत्मसम्मान विकसित करें। दबाव में निर्णय न लें। अपने शरीर का सम्मान करें। सही मित्र चुनें। जरूरत पड़ने पर मदद लें।
समाज के लिए- सकारात्मक वातावरण बनाएं। अच्छे रोल मॉडल प्रस्तुत करें। अश्लील सामग्री पर नियंत्रण। युवाओं के लिए मार्गदर्शन मंच
“फ्रेंड विद बेनिफिट” जैसी प्रवृत्तियाँ आधुनिकता के नाम पर युवाओं को भ्रमित कर रही हैं और उन्हें मानसिक, शारीरिक व सामाजिक संकट की ओर धकेल रही हैं। WHO, UNICEF और भारत सरकार के आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक है। इसका समाधान केवल कानून या डांट से संभव नहीं, बल्कि मजबूत परिवार, जागरूक शिक्षा, नैतिक मूल्यों और भावनात्मक सहयोग से ही संभव है। जब माता-पिता, शिक्षक, समाज और युवा मिलकर जिम्मेदारी निभाएँगे, तभी आने वाली पीढ़ी सुरक्षित, संतुलित और सशक्त बन सकेगी। “संस्कार, संवाद और संवेदनशीलता ही स्वस्थ समाज की नींव हैं।”

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