विजय सिंह एक अनुभवी शिक्षक और प्रधानाचार्य हैं, जिन्होंने अपने 23 वर्षों के करियर में शिक्षा के क्षेत्र में एक अमिट छाप छोड़ी है। वह वर्तमान में स्मृति पब्लिक स्कूल में प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत हैं।आपने अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक किया है और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लखीमपुर खीरी जिले में की, जहां उन्होंने बाबे के संस्थान और स्मृति संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया।
अपने शुरुआत के जीवन के बारे में बतायें और परिवार का कितना सहयोग मिला?
मेरी प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद में हुई। एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद, मेरे परिवार ने शिक्षा के महत्व को हमेशा प्राथमिकता दी और सीमित साधनों में भी यह सुनिश्चित किया कि मेरी पढ़ाई कभी बाधित न हो। माता-पिता का सहयोग एवं विश्वास मेरी सबसे बड़ी ताकत रहा। उन्होंने हमेशा मेरा संबल बढ़ाया और हर मोड़ पर प्रेरित किया।
आपके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिए?
मेरे अनुसार शिक्षा केवल डिग्री या नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। इसमें ज्ञान, संवेदना, नैतिकता और व्यावहारिकता का संतुलन जरूरी है। शिक्षा व्यक्ति को सोचने, समझने और समाज में सार्थक भूमिका निभाने योग्य बनाती है।
आप अपने विद्यार्थियों को कैसे प्रेरित करते हैं?
विद्यार्थियों को प्रेरित करने के लिए मैं उनके साथ मित्रवत् व्यवहार करता हूं और उन पर विश्वास जताता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति में कोई-न-कोई विशिष्ट प्रतिभा छिपी होती है। मैं अपने जीवन के सकारात्मक अनुभव साझा करता हूं ताकि वे समझें कि सफलता का रास्ता मेहनत और धैर्य से होकर ही जाता है। मेरा प्रयास रहता है कि वे जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना करें और आत्मविश्वासी बनें।
आपके अनुभव के अनुसार, एक आदर्श शिक्षक के क्या गुण होने चाहिए?
मेरे अनुभव में एक आदर्श शिक्षक वह है जो स्वयं निरंतर सीखता रहे, जिसमें धैर्य, संवेदना और दूरदृष्टि हो। एक शिक्षक को विद्यार्थियों की भाषा और मन को समझना आना चाहिए। वह केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि चरित्र निर्माण में भी सहभागी होता है।
आप अपने विद्यालय को कैसे आगे बढ़ाने की योजना बना रहे हैं?
विद्यालय को आगे बढ़ाने के लिए मैं केवल शैक्षिक परिणाम नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के संस्कार, व्यवहार और व्यावहारिक ज्ञान पर विशेष बल देता हूं। डिजिटल क्लासरूम, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास और जीवन कौशल आधारित कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित कर रहे हैं। मेरा लक्ष्य है कि विद्यालय में शिक्षा का वातावरण प्रेरणादायक और आनंददायक बना रहे।
आपके जीवन में सबसे बड़ा प्रभाव किसने डाला है और क्यों?
मेरे जीवन में सबसे बड़ा प्रभाव मेरे माता-पिता और मेरे प्रथम गुरुजनों ने डाला है। उन्होंने मुझे सिखाया कि सच्ची सफलता पद से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में किए गए सकारात्मक परिवर्तन से मापी जाती है। उनकी सादगी और समर्पण ने मुझे जीवन में विनम्र और कर्मठ बने रहने की प्रेरणा दी।
आप कैसे सुनिश्चित करते हैं कि आपके विद्यार्थी भविष्य में सफल हों?
विद्यार्थियों की सफलता सुनिश्चित करने के लिए मैं अनुशासन, लक्ष्य निर्धारण और आत्मविश्वास पर जोर देता हूं। करियर काउंसलिंग, संवाद तथा अभिभावकों के सहयोग से हम हर विद्यार्थी को उसके व्यक्तिगत कौशल और रुचि के अनुसार मार्गदर्शन देने का प्रयास करते हैं। हम शिक्षा के साथ-साथ जीवन कौशल भी प्रदान करते हैं।
आपके अनुसार, शिक्षा में तकनीक की भूमिका क्या होनी चाहिए?
मेरे विचार में तकनीक शिक्षा को गति और प्रभावशीलता प्रदान करती है, परन्तु इसका उपयोग केवल सहायक की तरह करना चाहिए। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग और डिजिटल सामग्री तभी लाभकारी होती है जब वे मानवीय संबंधों और नैतिक मूल्यों के साथ समायोजित हों। तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी है।
आज शिक्षा इतनी महँगी हो रही है और व्यापरिकरण बहुत हावी है — इसके लिए आप क्या कर रहे हैं?
मैं मानता हूं कि शिक्षा सबके लिए सुलभ होनी चाहिए, इसलिए हम अपने संस्थान में आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए हेल्प फंड और निशुल्क काउंसलिंग की व्यवस्था करते हैं। हमारा प्रयास है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ पैसे से न मिले, बल्कि प्रयत्न और समर्पण से उपलब्ध हो।
शिक्षक और विद्यार्थी के बीच सम्बन्ध कैसे होने चाहिए?
शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध बागवान और पौधे की तरह होना चाहिए, जिसमें स्नेह, अनुशासन और विश्वास का सही संतुलन हो। शिक्षक को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जहाँ विद्यार्थी निडर होकर अपनी जिज्ञासा व्यक्त कर सकें और स्वतंत्र रूप से सोच सकें। तभी शिक्षा सजीव और परिणामदायक हो सकती है।
सधन्यवाद
विजय सिंह


