नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश सरकार से जुड़े मामलों में हाई कोर्ट के बार-बार हस्तक्षेप पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हाई कोर्ट निर्वाचित सरकार के कामकाज में बाधा डाल रहा हो। साथ ही चेतावनी दी कि भविष्य में इस प्रकार के हस्तक्षेप को गंभीरता से लिया जाएगा।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थानीय निकाय चुनावों को टालने के लिए राज्य सरकार द्वारा परिसीमन प्रक्रिया का हवाला देना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत शहरी और ग्रामीण निकायों के चुनाव समय पर कराना अनिवार्य है और परिसीमन लंबित होना चुनाव स्थगित करने का आधार नहीं बन सकता।
हिमाचल प्रदेश में करीब 3,500 ग्राम पंचायतें, 90 पंचायत समितियां, 11 जिला परिषदें और 71 शहरी स्थानीय निकाय हैं, जिनमें इस वर्ष चुनाव प्रस्तावित हैं। हाई कोर्ट ने पहले चुनाव प्रक्रिया 30 अप्रैल तक पूरी करने का निर्देश दिया था और परिसीमन 28 फरवरी तक समाप्त करने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने सर्दियों में दूरदराज़ इलाकों में आने-जाने की कठिनाइयों और प्रशासनिक चुनौतियों को देखते हुए चुनाव की समयसीमा में आंशिक संशोधन किया। अदालत ने तैयारी संबंधी सभी कार्य 31 मार्च तक पूरा करने और इसके बाद आठ सप्ताह के भीतर, यानी 31 मई तक चुनाव अनिवार्य रूप से संपन्न कराने का आदेश दिया। साथ ही स्पष्ट कर दिया कि समय विस्तार के लिए कोई आवेदन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय जनगणना कार्य 1 मई से शुरू होने को ध्यान में रखते हुए समयसीमा तय की थी। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि समय निर्धारण में व्यवस्थागत कठिनाइयों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि स्थानीय निकायों के चुनाव कार्यकाल समाप्ति के बाद समय पर कराना संवैधानिक दायित्व है और इस संबंध में हाई कोर्ट के निर्देश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।