ज्योतिष शास्त्र और वास्तु शास्त्र दोनों ही हमारे जीवन को अधिक सफल और समृद्ध बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज्योतिष शास्त्र हमें अपने जीवन के बारे में जानने और भविष्य की योजना बनाने में मदद करता है, जबकि वास्तु शास्त्र हमें अपने घर और भवन को अधिक सुखद और शांतिपूर्ण बनाने में मदद करता है।
आज़ हम वार्तालाप करेंगे जितेंद्र अरोड़ा जी से,
जो जयपुर, राजस्थान से हैं । आप एक इंजीनियर हैं।
आप ज्योतिष शास्त्र और वास्तु शास्त्र में लगभग
7 वर्षों से सराहनीय कार्य कर रहे हैं।
न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल का ज्योतिष आचार्य जितेंद्र अरोड़ा के साथ एक्सक्लुसिव इंटरव्यू…
आचार्य जितेंद्र अरोड़ा जी, आपकी ज्योतिष शास्त्र में रुचि कैसे हुई, और परिवार का कितना सहयोग मिला?
मेरे जीवन के कठिन समय में मुझे जब सही ज्योतिषीय मार्गदर्शन मिला और मेरी उलझन दूर हुई तो मेरी जिज्ञासा इस साइंस को जानने व समझने की बढ़ गई । जब आप किसी विषय को समझना चाहते हैं तो स्वत: ही प्रकृति ऐसी व्यवस्था बना देती है, वही मेरे साथ हुआ और मैं ज्योतिष व वास्तु की यात्रा पर निकाल पड़ा। मेरे परिवार में कोई भी ज्योतिष का जानकार नहीं है तो उनके मन में भी जिज्ञासा तो हमेशा रहती थी कि ये साइंस क्या है ? पूर्ण सहयोग के साथ अब उनके प्रश्नों का तर्क संगत उत्तर देने की यात्रा जारी है।
आपके अनुसार, ज्योतिष शास्त्र और वास्तु शास्त्र क्या है, सरल भाषा मेँ बतायें हमारे जीवन मेँ क्या महत्व है?
ज्योतिष जो कि खगोलीय पिंडों, जिन्हे हम ग्रह/नक्षत्र या तारों के रूप में जानते हैं, का विज्ञान है । यह हमें एक आकाशीय मानचित्र प्रदान करता है, जिससे किसी भी जातक के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में सहायता मिलती है तथा
“क्या एवं कब” जैसे प्रश्नों से संबंधित रोडमैप मिलता है। निर्णय लेने में मार्गदर्शन मिलता है, कर्म तो हमें ही करना होगा क्यूंकी ज्योतिष कर्म सिद्धांत पर आधारित है। ज्योतिष हमें रास्ता दिखाता है,
चलना हमें खुद ही होता है।
वहीं वास्तु शास्त्र किसी भी स्थान को प्राकृतिक शक्तियों (पंचतत्व – पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि एवं वायु)
के अनुसार बनाने और सामंजस्यता सुनिश्चित करने का विज्ञान है, जिससे उस स्थान के सही उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके । उदाहरण के लिए किसी भी व्यक्ति को घर में सबसे जरूरी क्या चाहिये ?
सुख-शांति और आराम
इसका अर्थ है उस स्थान पर सात्विक ऊर्जा का प्रवाह अधिक होना चाहिये ।
जैसे खिड़की से हवा और रोशनी आती है और मन अच्छा रहता है,
वैसे ही सही दिशा और व्यवस्था से जीवन में शांति आती है। बस यही वास्तु है।
आप दशा और दिशा के बीच के संबंध को कैसे समझते हैं?
ज्योतिष (दशा) एवं वास्तु (दिशा) का बहुत गहरा संबंध है,
दशा अर्थात व्यक्ति के जीवन में किस ग्रह की दशा यानि किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है जो हमारे विचार, अवसर और निर्णय को प्रभावित करता है
वहीं वास्तु से हमें दिशा का ज्ञान होता है जहां से हम ऊर्जा ले रहे होते हैं।
और अधिक आसान शब्दों में
दशा “कब ” एवं दिशा “कहाँ से” का ज्ञान करवाती है, जब दशा एवं दिशा अनुकूल हो तो कार्य आसान हो जाते हैं, अवसर मिलने लगते हैं यानी मन शांत एवं प्रसन्न रहता है।
उदाहरण के तौर पर यदि हमें जयपुर से दिल्ली जाना है तो
किस साधन से जाएंगे (बस, रेल या हवाईजहाज) ये दशा है
गंतव्य पर जाने का सही रास्ता (कॉर्डिनटेस) दिशा है। दोनों सही होंगे तो यात्रा सुखद होगी।
आचार्य जितेंद्र अरोड़ा जी, आपके अनुसार, ग्रहों, राशियों तथा दिशाओं के आपसी संबंध को सरल भाषा मेँ पाठकों को बतायें?
हर ग्रह की एक खास ऊर्जा होती है, वह ऊर्जा किसी राशि से जुड़ी होती है और वही ऊर्जा किसी दिशा में ज़्यादा प्रभाव डालती है।
ग्रह हमारे जीवन के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं: जैसे कोई ग्रह मन का कारक है, कोई धन का, कोई पराक्रम का तो कोई शिक्षा का ।
राशियाँ बताती हैं कि: ग्रह अपनी ऊर्जा किस तरीके से प्रकट करेगा ?
दिशाएँ यह दर्शाती हैं कि: वह ऊर्जा कहाँ और कैसे काम करेगी ?
उदाहरण के लिए
बुध जोकि मिथुन, कन्या राशि के स्वामी हैं । बुद्धि, व्यापार, वाणी के कारक माने जाते हैं ।
दिशा: उत्तर
उत्तर दिशा साफ तथा संतुलित हो तो धन और समझ बढ़ती है, नए अवसर मिलते हैं।
पंचांग क्या होता है, और कोनसे शास्त्र मेँ वर्णन मिलता है?
पंचांग समय को समझने और शुभ मुहूर्त निर्धारण की भारतीय वैदिक पद्धति है।
“पंचांग” शब्द बना है:
पंच + अंग यानी समय के पाँच अंग
वार, तिथि, नक्षत्र, योग, और करण।
ये पाँच अंग मिलकर बताते हैं कि कौन-सा दिन, कौन-सा समय, किस कार्य के लिए उपयुक्त है।
जैसे घड़ी से घंटे/मिनट, कैलंडर से तारीख देखते हैं वैसे ही पंचांग से उस समय की गुणवत्ता पता चलती है।
पंचांग का सबसे प्राचीन और स्पष्ट वर्णन वेदांग ज्योतिष में मिलता है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में
समय, तिथि और नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है।
आचार्य जी, ज्योतिष मेँ अमावस्या, शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष जैसे शब्दों का उपयोग होता है, इन सभी को सरल भाषा मेँ समझायें?
ज्योतिष में ये शब्द चंद्रमा से जुड़े हैं। चंद्रमा रोज़ थोड़ा-थोड़ा बदलता हुआ दिखाई देता है
अमावस्या वह दिन होता है जब चंद्रमा बिल्कुल दिखाई नहीं देता क्यूंकि चंद्रमा सूर्य के बिल्कुल पास होता है और उसकी रोशनी हमें नहीं दिखती अर्थात जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में साथ होते हैं।
पूर्णिमा वह दिन जब चंद्रमा पूरा गोल और चमकदार दिखता है। चंद्रमा पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए जब सूर्य के विपरीत आ जाता है, तब सूर्य की किरणें चंद्रमा पर पड़ती हैं और वह पूरा प्रकाशित दिखाई देता है अर्थात सूर्य और चंद्रमा एक-दूसरे से ठीक सामने (180 डिग्री या 7वें घर में) होते हैं।
पूर्णिमा व अमावस्या के बीच के समय को शुल्क/कृष्ण पक्ष कहा गया है ।
शुक्ल पक्ष = बढ़ता हुआ चंद्रमा जिसका अर्थ है नई शुरुआत, वृद्धि, सकारात्मकता
इसलिए:शुभ कार्य जैसे विवाह गृह प्रवेश अक्सर शुक्ल पक्ष में किए जाते हैं।
कृष्ण पक्ष = घटता हुआ चंद्रमा जिसका अर्थ है समापन, आत्ममंथन, त्याग
इसलिए पितृ कार्य, साधना या पुराने काम पूरे करना कृष्ण पक्ष में किए जाते हैं।
आपकी राय में, किसी जातक की कुंडली में अच्छी दशा होने के बाद भी सफलता क्यों नहीं मिलती?
सबसे पहले तो अपने कर्म को देखना बहुत आवश्यक है कि क्या व्यक्ति जो प्राप्त करना चाहता है
क्या वो उचित है?
क्या सफलता प्राप्त करने के लिए पूर्ण मेहनत की है?
यदि हाँ तो ज्योतिषीय सहायता लेना उचित होगा।
अच्छी दशा का मतलब क्या है? सामान्यतया यह माना जाता है
शुभ ग्रह की दशा = तुरंत सफलता
परंतु दशा केवल समय बताती है,परिणाम देने के लिए कई और बातें साथ चलनी ज़रूरी होती हैं।
उस ग्रह में कितना बल (षडबल) है, यह देखना होता है और भी बहुत कुछ ।
उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति की शुभ ग्रह की दशा चल रही है, वो मेहनत भी कर रहा है परंतु यदि वो ग्रह कुंडली में कमजोर स्थिति जैसे अस्त/शत्रु राशी या नीच राशी में है तो संभावना है अधिक मेहनत के बाद नोकरी लगे पर सैलरी कम हो।
जैसे बीज अच्छा है, पर मौसम खराब। भाग्य से ज़्यादा कर्म की परीक्षा
निष्कर्ष – अच्छी दशा = अवसर
मेहनत + सही दिशा + सही समय = सफलता
आपकी भविष्यवाणी के अनुसार, आने वाले समय में ज्योतिष शास्त्र का क्या महत्व होगा?
मेरे अनुभव से ज्योतिष का स्वरूप बदलेगा और दायरा बढ़ेगा। “डराने वाला” नहीं, “मार्गदर्शक” बनेगा ।
अब लोग ज्योतिष मे ग्रह दोष/भए या भारी उपाय की बजाय
सही समय क्या है?
किस दिशा में प्रयास करें?
मेरी ताकत क्या है? जैसे प्रश्नों को पूछने लगे हैं , जोकि उचित है ज्योतिष अब सलाहकार की भूमिका निभाएगा, न्यायाधीश की नहीं। क्योंकि कर्म तो जातक को करना ही है तभी कुछ होगा, मात्र अच्छे योग या शुभ ग्रह की दशा से नहीं।
उपायों की जगह व्यवहार सुधार पर ज़ोर देना चाहिए ।
भविष्य का ज्योतिष:
“यह पहन लो” से ज़्यादा “यह आदत बदलो” पर ज़ोर देगा।
आप कैसे तय करते हैं कि किसी जातक के लिए कौन सी दिशा सबसे उपयुक्त है?
बहुत बेहतरीन प्रश्न पूछा है आपने
इसी जगह पर ज्योतिष और वास्तु वास्तव में मिलते हैं।
सबसे पहले यह समझना होगा कि कोई भी दिशा बुरी नहीं हो सकती। ईश्वर तत्व सभी जगह है चाहे पूर्व, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण दिशा हो।
जातक के जन्म के समय जो आकाशीय पिंडों का जो चित्र बन जाता है जिसे हम कुंडली कहते हैं उससे ये जानने मे मदद मिल जाती है कि जातक के लिए कोनसी दिशा सबसे उत्तम रह सकती है बाकी जो पहले बताया है सभी दिशाओं के मूल तत्व तो अपना अपना काम करेंगे ही।
हमारा शरीर पंचतत्वों से मिलकर बना है और यही पंचतत्व हमारे घर या किसी भी संस्थान में भी मौजूद रहते हैं। यदि इन पंचतत्वों का संतुलन बना कर व्यक्ति कर्म करे तो सफलता की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। ज्योतिष व्यवहारिक समाधान देता है, असंभव आदेश नहीं।
कुंडली में लग्न बताता है आप कौन हैं
दशा बताती है अभी क्या चल रहा है
दिशा बताती है ऊर्जा कहाँ से आएगी
तीनों मिलें → सही दिशा तय होती है।
आपकी राय में, ज्योतिष शास्त्र और वास्तु शास्त्र का हमारे दैनिक जीवन में क्या महत्व है?
मेरी राय में यह अनुभव, तर्क और व्यवहार तीनों पर आधारित है। ज्योतिष या वास्तु शास्त्र को हमारे जीवन के नियंत्रक नहीं सहायक तंत्र समझना चाहिए। सही ढंग से समझा गया ज्योतिष अंधविश्वास नहीं बढ़ाता बल्कि डर कम करता है। जब कारण समझ आता है, तो व्यक्ति परिस्थितियों से लड़ता है, भागता नहीं।
ज्योतिष समय बताता है- कारण समझाता है- आपके भीतर कार्य करता है
वास्तु स्थान सुधारता है- वातावरण ठीक करता है- बाहर कार्य करता है
दोनों एकदूसरे के बिना अधूरे प्रतीत होते हैं।
सबसे अहम बात
न ज्योतिष भाग्य बदलता है
न वास्तु चमत्कार करता है
लेकिन ये दोनों मिलकर जीवन को सरल, स्पष्ट और संतुलित बना देते हैं।
आपकी खोज के अनुसार, दशा और दिशा के बीच के संबंध को समझने से हमें क्या लाभ हो सकता है?
ज्योतिष- दशा (Time )
वास्तु- दिशा (Direction )
सही समय और सही स्थान पर कार्य करने से उस कार्य की पूर्ति होने के संभावनाएं अधिक होती हैं ।
कुंडली से जीवन का “फोकस एरिया” तय करें जैसे व्यक्ति की मुख्य शक्ति या सफलता का क्षेत्र क्या है :- नौकरी, व्यापार, शिक्षा या कला । फिर जो ग्रह सक्रिय है वास्तु अनुसार उसी ग्रह की दिशा को मजबूत करना चाहिए तथा अपने कर्म पर पूरा ध्यान देना चाहिए ।
आप अपने अनुभव से बताएं, ज्योतिष शास्त्र और वास्तु शास्त्र के संयोजन से कैसे सफलता प्राप्त की जा सकती है?
यहीं से ज्योतिष और वास्तु किताब से निकलकर जीवन में उतरते हैं।
ज्योतिष- समय (Time )
वास्तु- स्थान (Space )
जब सही समय और सही दिशा में काम करने लगते हैं, तो व्यक्ति को सफलता स्वाभाविक रूप से मिलने लगती है।
ज्योतिष अवसर बताता है, वास्तु उस अवसर को पकड़ने की जगह देता है।
दोनों के संयोजन से सही निर्णय लेने में सहायता होती है , संघर्ष कम होता है।
आप पाठकों का क्या सन्देश देना चाहते हैं जिससे उनके जीवन मेँ सुख, शांति और समृद्धि बढ़े?
सबसे पहले तो अंधविश्वास से बाहर निकल कर वास्तविकता को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए ।
कर्म को सर्वोपरी स्थान देना चाहिए क्योंकि ज्योतिष भी कर्म के सिद्धांत पर आधारित है । ज्योतिष को मार्गदर्शक के रूप में देखना चाहिए नाकि नियंत्रक के रूप में। असंभव वही लगता है जो हमारी सोच से परे हो, मेहनत और लगन से सब कुछ संभव है

