राजस्थान के सिरोही जिले के पिंडवाड़ा क्षेत्र में मेसर्स कमलेश मेटा कास्ट प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित चुनाव पत्थर खनन परियोजना के खिलाफ आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। रविवार को भारजा गांव में संघर्ष समिति और चार ग्राम पंचायतों के करीब 12 गांवों के ग्रामीणों की संयुक्त बैठक हुई, जिसमें आंदोलन की आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि यदि जिले के जनप्रतिनिधि 15 नवंबर तक मुख्यमंत्री से मुलाकात कर इस मामले का समाधान नहीं निकालते, तो आंदोलन अब उग्र रूप लेगा। ग्रामीणों ने कहा कि खनन परियोजना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इससे क्षेत्र की पर्यावरणीय, सामाजिक और सांस्कृतिक संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
संघर्ष समिति ने साफ चेतावनी दी है कि अगर तय समय तक उचित समाधान नहीं निकला, तो स्थानीय जनप्रतिनिधि, पंचायत प्रतिनिधि और कार्यकर्ता सामूहिक रूप से अपने पदों से त्याग पत्र सौंपेंगे। समिति का कहना है कि पिछले दो महीने से जनता शांतिपूर्वक आंदोलन कर रही है, लेकिन सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। वक्ताओं ने कहा कि “जनता का धैर्य अब टूटने की कगार पर है”, और यदि सरकार ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई, तो पिंडवाड़ा, भीमाणा, भारजा, वाटेरा और रोहिड़ा सहित पूरे सिरोही जिले में आंदोलन की लपटें फैल सकती हैं।
ग्रामीणों ने परियोजना को जनजीवन और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बताते हुए कहा कि यह खनन कार्य क्षेत्र के जलस्तर, खेती, पशुपालन और पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल असर डालेगा। समिति ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस परियोजना से जुड़ा समझौता (MOU) निरस्त किया जाए, पर्यावरणीय स्वीकृति को रोका जाए और राज्य सरकार इस मामले में न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दाखिल करे।
ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन यह परियोजना जनविरोधी है। इसलिए सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए जल्द संवेदनशील निर्णय लेना चाहिए, ताकि क्षेत्र में शांति और विश्वास कायम रह सके।
रिपोर्ट – विक्रम रावल, सिरोही