
न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल
सवाल
डॉक्टर साहब, अगर आपको एक दिन के लिए सभी स्कूलों का प्रिंसिपल बना दिया जाए, तो आप शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव करना चाहेंगे?
जवाब
देखिए, मैं सबसे पहले बच्चों की मेंटल हेल्थ पर काम करूंगा। आज के समय में बच्चे 99 प्रतिशत अंक लेकर आ रहे हैं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास की कमी दिखाई देती है। मुझे दुख होता है कि इतने अच्छे अंक लाने के बावजूद बच्चे अपने पसंदीदा विषय चुनने से डरते हैं। वे साइंस या मैथ्स लेने से घबराते हैं, क्योंकि उनके अंदर असफलता का डर बैठ चुका होता है। मेरा मानना है कि बच्चों को डायनेमिक बनाना चाहिए, रटा हुआ तोता नहीं। स्कूलों को उनके मानसिक विकास, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता पर काम करना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक लाना नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना भी होना चाहिए।

सवाल
फिजियोथेरेपी को लेकर एक धारणा है कि यह केवल बुजुर्गों के लिए होती है। आज के युवाओं को आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
जवाब
पहले के समय में फिजियोथेरेपी को हड्डियों और उम्र से जुड़ी समस्याओं से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
आज हड्डियां नहीं, बल्कि हड्डियों के जोड़ और मांसपेशियां हमारी जीवनशैली की वजह से प्रभावित हो रही हैं। आज की युवा पीढ़ी लंबे समय तक मोबाइल और लैपटॉप का उपयोग करती है, शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं और गलत पोश्चर आम हो गया है।इसलिए मैं मानता हूं कि आज के समय में फिजियोथेरेपी केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि हर आयु वर्ग के लिए आवश्यक हो सकती है।
सवाल
डॉक्टर साहब, अब फिजियो रोबोट भी आ गए हैं। क्या आपको लगता है कि 2030 तक यह फिजियोथेरपिस्ट के लिए चुनौती होगी या अवसर?

जवाब
यह बहुत विवादित सवाल है और इसका जवाब भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए।रोबोटिक फिजियोथेरेपी कहीं न कहीं प्रोफेशनल्स को टेक्नीशियन में बदल रही है।मैं पिछले 17 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहा हूं। हम जैसे फिजियोथेरपिस्ट अपने अनुभव और मेहनत के बल पर आगे बढ़ते हैं। लेकिन डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपये की मशीनें हर कोई नहीं खरीद सकता।ऐसी मशीनें अक्सर बड़े निवेशक या व्यवसायी खरीदते हैं और उनके संचालन के लिए प्रोफेशनल्स को नियुक्त करते हैं।समस्या तब आती है, जब एक थेरेपिस्ट केवल मशीनों पर निर्भर हो जाता है। यदि वह इंसानों को छूकर उनकी समस्याओं को समझने, काउंसलिंग करने और मैनुअल थेरेपी करने की कला से दूर हो जाए, तो उसका विकास सीमित हो सकता है।मेरे अनुसार तकनीक का उपयोग सहायक के रूप में होना चाहिए, विकल्प के रूप में नहीं।
सवाल
आप बार-बार इंसानी स्पर्श और भावनात्मक जुड़ाव की बात करते हैं। यह कितना जरूरी है?

जवाब
बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि एक मां कई बार किसी थेरेपिस्ट से भी ज्यादा समझदार होती है। वह अपने बच्चे का चेहरा देखकर बता देती है कि उसे भूख लगी है, प्यास लगी है या वह असहज महसूस कर रहा है। उसी तरह, एक अच्छे थेरेपिस्ट को भी मरीज के साथ जुड़ना पड़ता है। जब तक आप मरीज को समझेंगे नहीं, तब तक आप उसकी मांसपेशियों की वास्तविक समस्या को महसूस नहीं कर पाएंगे। हमारा काम पर्चा लिखना या दवाइयां बताना नहीं है। हमारा काम है शरीर को समझना और मूवमेंट के माध्यम से उसे बेहतर बनाना।
सवाल
अगर दर्द बोल सकता, तो वह आईटी प्रोफेशनल्स से क्या शिकायत करता? दर्द के वकील बनकर आप क्या कहना चाहेंगे?

जवाब
मैं यही कहूंगा कि हर पोश्चर अपने बारे में बताता है।जिस स्थिति में आप लंबे समय तक रहते हैं और जहां दर्द या असहजता महसूस होती है, वहां आपका शरीर आपको संकेत दे रहा होता है कि बदलाव की जरूरत है।इसलिए अपनी बॉडी को समझिए।जहां भी डिस्कम्फर्ट या दर्द महसूस हो, उसे नजरअंदाज करने के बजाय उसे सुधारने का प्रयास कीजिए।हर आधे घंटे में अपनी जगह से उठिए। थोड़ा चलिए-फिरिए। सीढ़ियां चढ़िए-उतरिए। ब्रेन जिम एक्सरसाइज कीजिए। अपने दोस्तों से हंसते-बोलते रहिए।क्योंकि शरीर में जितना ज्यादा मूवमेंट होगा, उतना ही अच्छा ऑक्सीजन सप्लाई होगी। जितना बेहतर ऑक्सीजन होगा, उतना ही बेहतर ब्लड सर्कुलेशन होगा।एक ही जगह बैठे-बैठे आप अपने शरीर को धीरे-धीरे कमजोर करते जाते हैं।इसलिए सक्रिय रहिए, शरीर की सुनिए और समय रहते बदलाव कीजिए।

सवाल
अंत में, हमारे पाठकों के लिए आपका क्या संदेश होगा?
जवाब
मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि अपने शरीर को समझिए। शरीर आपको हर समय संकेत देता है। थकान, दर्द, असहजता या तनाव – ये सभी संकेत हैं कि आपको अपनी जीवनशैली पर ध्यान देने की जरूरत है। अपनी खुशियों को टालिए मत। अपने परिवार के साथ समय बिताइए। मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखिए। नियमित रूप से शरीर को मूवमेंट दीजिए। दर्द को केवल दवाइयों से दबाने की कोशिश मत कीजिए। उसके कारणों को समझिए और उन्हें दूर करने का प्रयास कीजिए। क्योंकि मेरा हमेशा से यही मानना रहा है “दर्द को दवा नहीं, मूवमेंट से हराओ।”
