
न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल
नई दिल्ली। बदलते समय के साथ शिक्षा के साधन, जीवनशैली और संवाद के तरीके भले ही बदल गए हों, लेकिन स्कूल की यादें आज भी हर व्यक्ति के जीवन की सबसे अनमोल धरोहर मानी जाती हैं। बचपन की शरारतें, कक्षा का अनुशासन, शिक्षकों का मार्गदर्शन, मित्रों का साथ और स्कूल के गलियारों में बिताए गए अनगिनत पल जीवनभर स्मृतियों में जीवित रहते हैं। यही कारण है कि जब इन अनुभवों को साहित्य का रूप मिलता है तो वे केवल कहानियाँ नहीं रह जातीं, बल्कि लाखों पाठकों की अपनी यादों का आईना बन जाती हैं।
इन्हीं भावनाओं को शब्दों में पिरोने का कार्य किया है लेखक बृजेश कुमार (धीरज) ने अपनी पुस्तक “The School Diary: 10 Short Stories” के माध्यम से। यह पुस्तक दस लघु कथाओं का संग्रह होने के साथ-साथ उन भावनात्मक अनुभवों का दस्तावेज़ भी है, जो लगभग हर विद्यार्थी ने अपने स्कूल जीवन में कभी न कभी महसूस किए हैं। पुस्तक में बचपन की मासूमियत, शिक्षकों का स्नेह, मित्रता, अनुशासन, शरारतें और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

बिहार के कैमूर जिले से मूल रूप से संबंध रखने वाले बृजेश कुमार धीरज का बचपन शिक्षा की बेहतर संभावनाओं की तलाश में देहरादून पहुँचा। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा देहरादून के प्रतिष्ठित कैम्ब्रियन हॉल स्कूल से प्राप्त की। आगे चलकर दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और बाद में इतिहास विषय में (परास्नातक) स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) अन्नामलाई विश्वविद्यालय से किया।
विद्यार्थी जीवन से ही उन्हें लेखन का शौक था। स्कूल की पत्रिकाओं में उनके लेख और रचनाएँ प्रकाशित होती थीं, जिसने उनके भीतर लेखक बनने का आत्मविश्वास पैदा किया। वर्षों तक संजोई गई स्मृतियाँ अंततः उनकी पहली पुस्तक का आधार बनीं।

बृजेश कुमार धीरज का मानना है कि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं होता, बल्कि परिवार और शिक्षकों से मिले संस्कार उसकी सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। उनकी माता संस्कृत की शिक्षिका थीं, जिन्होंने बचपन से ही उन्हें रामायण, महाभारत और भारतीय संस्कृति की प्रेरक कथाएँ सुनाईं। वहीं विद्यालय के शिक्षकों ने अनुशासन, व्यवहार और जीवन को देखने की सकारात्मक दृष्टि प्रदान की। यही कारण है कि उनकी पुस्तक में शिक्षक केवल एक पात्र नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देते हैं।
AajKiKhabar.com के साथ हुई विशेष बातचीत में बृजेश कुमार धीरज ने अपने बचपन, शिक्षा, लेखन की शुरुआत, पुस्तक लिखने की प्रेरणा, बदलते शिक्षा परिवेश, डिजिटल युग में पुस्तकों की भूमिका और अपनी आगामी साहित्यिक योजनाओं पर खुलकर विचार साझा किए।
आपके जीवन की शुरुआत और शिक्षा का सफर कैसा रहा?
मेरा जन्म बिहार में हुआ। उस समय बेहतर शिक्षा की सुविधाएँ सीमित थीं, इसलिए मेरे माता-पिता मुझे बचपन में ही देहरादून ले गए। घर से दूर रहना आसान नहीं था, लेकिन वहीं मुझे ऐसे शिक्षक मिले जिन्होंने केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि अनुशासन, व्यवहार और व्यक्तित्व निर्माण की शिक्षा भी दी। आज भी मैं अपने शिक्षकों से मिली सीख को जीवन की सबसे बड़ी पूँजी मानता हूँ।
आपके परिवार का आपके व्यक्तित्व निर्माण में कितना योगदान रहा?
मेरे पिता कृषक थे और मेरी माता संस्कृत की शिक्षिका थीं। घर का वातावरण भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों से भरा हुआ था। माता जी रामायण, महाभारत और महापुरुषों की कहानियाँ सुनाया करती थीं। उन्हीं से पढ़ने, सोचने और लिखने की प्रेरणा मिली। यदि आज मैं लेखन के क्षेत्र में हूँ तो इसका सबसे बड़ा श्रेय अपने परिवार को देता हूँ।

लेखन की शुरुआत कैसे हुई?
स्कूल की पत्रिका में मैं नियमित रूप से लेख और कविताएँ लिखा करता था। मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं और शिक्षकों से प्रोत्साहन मिलता था। वहीं से मुझे विश्वास हुआ कि लेखन मेरे विचारों को समाज तक पहुँचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है।
‘The School Diary: 10 Short Stories’ लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
स्कूल की यादें कभी समाप्त नहीं होतीं। मैंने महसूस किया कि हर व्यक्ति अपने छात्र जीवन से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है। इसी सोच के साथ मैंने अपने अनुभवों और यादों को कहानियों का रूप दिया ताकि पाठक स्वयं को इन कहानियों में महसूस कर सकें।

क्या इस पुस्तक में आपके जीवन के अनुभव भी शामिल हैं?
हाँ, पुस्तक की कई घटनाएँ मेरे अपने अनुभवों से प्रेरित हैं। कुछ पात्र वास्तविक जीवन से जुड़े हैं और कुछ घटनाओं को साहित्यिक रूप दिया गया है। मेरा उद्देश्य यही था कि हर पाठक को लगे कि यह उसकी अपनी कहानी है।
आज के डिजिटल दौर में पुस्तकों का महत्व कितना है?
तकनीक जीवन का हिस्सा है और उसका उपयोग होना चाहिए, लेकिन किताबों का महत्व कभी कम नहीं हो सकता। मोबाइल हमें सूचना देता है, जबकि पुस्तकें हमें सोचने, समझने और जीवन को गहराई से देखने की दृष्टि देती हैं। नई पीढ़ी को पढ़ने की आदत बनाए रखनी चाहिए।

आपकी अगली साहित्यिक योजना क्या है?
मैं एक नए फिक्शन उपन्यास पर कार्य कर रहा हूँ। उसमें गाँव से लेकर महानगर, समाज, राजनीति, प्रशासन और सामान्य जीवन की अनेक वास्तविकताओं को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा।
सांसद मनोज तिवारी जी से आपकी पहली मुलाकात कैसे हुई और आपकी पुस्तक ‘द स्कूल डायरी: 10 शॉर्ट स्टोरीज़’ पर उनकी क्या प्रतिक्रिया रही?
मैं लंबे समय से सांसद श्री मनोज तिवारी जी के कार्यों को देखता और उनसे प्रेरित होता रहा हूँ। उनसे पहली मुलाकात तब हुई, जब मैं अपने क्षेत्र से जुड़े कुछ सामाजिक विषयों को लेकर उनसे मिलने गया। बातचीत के दौरान उन्होंने मेरी लेखनी, सामाजिक सोच और रचनात्मक कार्यों में रुचि दिखाई। बाद में जब मैंने अपनी पुस्तक ‘द स्कूल डायरी: 10 शॉर्ट स्टोरीज़’ उन्हें भेंट की, तो उन्होंने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह केवल स्कूल की यादों का संग्रह नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को संस्कारों, शिक्षकों के सम्मान और बचपन की मधुर स्मृतियों से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास है।
उन्होंने मुझे निरंतर लिखते रहने और समाज को सकारात्मक दिशा देने वाला साहित्य सृजित करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रेरक शब्दों ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया और मुझे यह विश्वास दिलाया कि यदि लेखन ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ किया जाए, तो वह समाज पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकता है। एक लेखक के लिए किसी वरिष्ठ जनप्रतिनिधि का प्रोत्साहन अत्यंत प्रेरणादायक होता है और मनोज तिवारी जी का मार्गदर्शन मेरे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
पाठकों के लिए आपका संदेश।

रील्स देखिए, तकनीक अपनाइए, लेकिन किताबों से अपना रिश्ता कभी मत तोड़िए। यदि आप अपने संस्कारों, भावनाओं और जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझना चाहते हैं तो पुस्तकों को अपने जीवन का हिस्सा बनाइए। अच्छी किताबें केवल ज्ञान नहीं देतीं, बल्कि बेहतर इंसान भी बनाती हैं।