
न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल
देहरादून के एक अनुशासित आर्मी परिवार से निकलकर मुंबई की प्लेबैक सिंगिंग तक का सफर शीतल गुप्ता के लिए आसान नहीं रहा। शादी, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने संगीत से अपना रिश्ता कभी नहीं टूटने दिया। आज वह प्लेबैक सिंगर, गीतकार, संगीतकार, निर्माता और क्रिएटिव प्रोफेशनल के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। फिल्म “Virgin Bhanupriya” के चर्चित गीत “कद्दी हूँ करके”, “जीत कर दिखाना है”, वेब सीरीज़ “अवैध” के टाइटल ट्रैक और हाल ही में रिलीज़ हुए सिंगल “फकीरी” जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके संगीत सफर को नई पहचान दी है। इस विशेष बातचीत में उन्होंने अपने संघर्ष, परिवार के सहयोग, रचनात्मक सफर, नए प्रोजेक्ट्स और संगीत को लेकर अपनी सोच साझा की। प्रस्तुत है पत्रकार अंकित कुमार गोयल के साथ हुई यह विशेष फीचर बातचीत।

शादी के बाद संगीत में दोबारा वापसी का फैसला कितना मुश्किल था?
संगीत हमेशा से मेरी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा रहा है। शादी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ समय के लिए मेरी संगीत यात्रा की गति जरूर धीमी हुई, लेकिन संगीत से मेरा रिश्ता कभी नहीं टूटा। जब मैंने दोबारा पूरी गंभीरता से संगीत में लौटने का फैसला किया, तो मेरे परिवार ने मेरा पूरा साथ दिया। खास तौर पर मेरे पति मनीष गुप्ता ने हमेशा मुझ पर विश्वास किया और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनका यही विश्वास मेरे लिए नई ऊर्जा और आत्मविश्वास बना। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि सपनों को फिर से जीने के लिए सही समय से ज्यादा जरूरी अपने लोगों का विश्वास होता है।

दिल्ली और मुंबई के बीच लगातार सफर को कैसे संभालती हैं?
2015 से मेरी जिंदगी का बड़ा हिस्सा दिल्ली और मुंबई के बीच बीत रहा है। कई बार ऐसा लगता है कि पूरी जिंदगी एक सूटकेस में सिमट गई है, लेकिन जब आपका लक्ष्य स्पष्ट होता है तो सफर कठिन नहीं लगता। मैंने समय का संतुलन बनाना सीखा है। परिवार, बेटी और संगीत—तीनों को बराबर महत्व देना ही मेरी सबसे बड़ी सीख रही है।

“कद्दी हूँ करके” से जुड़ी सबसे यादगार बात क्या रही?
यह मेरे करियर के अहम प्रोजेक्ट्स में से एक था। जब किसी फिल्म के लिए गाना रिकॉर्ड करते हैं, तो जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। रिकॉर्डिंग के दौरान यही सोच थी कि गाना दर्शकों के दिल तक पहुँचे। जब फिल्म रिलीज़ हुई और लोगों ने इस गीत को पसंद किया, तो लगा कि मेहनत सफल हुई। फिल्म रिलीज़ होने के बाद दर्शकों से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया ने इस गीत को मेरे करियर की यादगार उपलब्धियों में शामिल कर दिया। “जीत कर दिखाना है” आपके संगीत सफर का एक खास प्रोजेक्ट रहा। इस दौरान संगीतकार राजेश रॉय के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा और कैलाश खेर जी, कुनाल गांजावाला जी तथा उषा उत्थुप जी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करते हुए आपको किन खास अनुभवों और सीख से गुजरने का अवसर मिला?

“जीत कर दिखाना है” मेरे लिए बेहद यादगार प्रोजेक्ट रहा। संगीतकार राजेश रॉय के साथ काम करते हुए मैंने जाना कि एक अच्छे संगीतकार की पहचान सिर्फ बेहतरीन धुन बनाने में नहीं, बल्कि कलाकार से उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकलवाने में भी होती है। उनकी कार्यशैली बेहद अनुशासित, सकारात्मक और संगीत के प्रति समर्पित है। इस प्रोजेक्ट में कैलाश खेर जी, कुनाल गांजावाला जी और उषा उत्थुप जी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करना मेरे लिए बहुत बड़ा अनुभव और सम्मान रहा। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला और यह अनुभव मेरे आत्मविश्वास को भी मजबूत करने वाला रहा। “जीत कर दिखाना है” मेरे संगीत सफर की उन खास यादों में शामिल है, जिन्हें मैं हमेशा संजोकर रखूँगी।

‘फकीरी’ की शुरुआत कैसे हुई? इस गाने के पीछे क्या सोच थी?
‘
फकीरी’ मेरे लिए सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि एक एहसास है। इसकी कहानी जिंदगी के अनुभवों से निकली है। मैंने इसे खुद लिखा, कंपोज़ किया और गाया। पहली बार इस प्रोजेक्ट में निर्माता की जिम्मेदारी भी संभाली। मैं चाहती थी कि ‘फकीरी’ केवल एक गीत बनकर न रह जाए, बल्कि उसके भाव और संदेश भी लोगों के दिलों तक पहुँचें।

एक गायिका से गीतकार, संगीतकार और निर्माता बनने तक की आपकी रचनात्मक यात्रा ने आपको क्या सिखाया?
जब आप केवल गायक होते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी मुख्यतः अपनी प्रस्तुति तक सीमित रहती है। लेकिन जब गीत लिखने, संगीत तैयार करने और निर्माता की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी भी आपके पास हो, तो आपको पूरे प्रोजेक्ट को शुरुआत से लेकर अंतिम प्रस्तुति तक एक साथ देखना पड़ता है। ‘फकीरी’ मेरे लिए इसी मायने में एक नया और यादगार अनुभव रहा। पहली बार मैंने एक ही प्रोजेक्ट में गीत लेखन, संगीत संयोजन, गायन, निर्माण और कॉस्ट्यूम डिज़ाइन जैसी कई जिम्मेदारियाँ निभाईं। इस प्रक्रिया ने मुझे सिखाया कि किसी भी अच्छे गीत की पहचान केवल उसकी धुन या आवाज़ से नहीं बनती, बल्कि उसके पीछे की सोच, सूक्ष्म तैयारी, सही टीम और हर छोटे-बड़े निर्णय से बनती है।
इस यात्रा ने मुझे एक कलाकार के साथ-साथ एक जिम्मेदार रचनाकार के रूप में भी विकसित किया। अब मैं किसी गीत को केवल गाने के रूप में नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में देखती हूँ। मेरा प्रयास रहेगा कि आने वाले हर प्रोजेक्ट में कुछ नया सीखूँ और श्रोताओं तक ऐसा संगीत पहुँचाऊँ, जो केवल सुनाई ही नहीं दे, बल्कि उनके दिलों तक भी पहुँचे।

इंडिपेंडेंट म्यूजिक और फिल्मी संगीत में आप क्या अंतर महसूस करती हैं?
फिल्मी गीतों में कहानी और निर्देशक की जरूरत के अनुसार काम करना होता है, जबकि इंडिपेंडेंट म्यूजिक में कलाकार अपनी सोच और भावनाओं को खुलकर अभिव्यक्त कर सकता है। ‘फकीरी’ मेरे लिए इसलिए खास है क्योंकि इसमें मेरी सोच, मेरी लेखनी और मेरा संगीत—सब कुछ मेरा अपना है।
आप ‘शूट एट साइट मोशन पिक्चर्स’ में क्रिएटिव हेड भी हैं। एक गायक से क्रिएटिव हेड बनने के सफर ने आपको क्या सिखाया?
एक गायक के रूप में मेरी सोच पहले सिर्फ अपनी प्रस्तुति तक सीमित रहती थी, लेकिन क्रिएटिव हेड बनने के बाद मैंने पूरे प्रोजेक्ट को एक व्यापक नजरिए से देखना सीखा। अब मेरा ध्यान केवल गीत या परफॉर्मेंस पर नहीं, बल्कि उसकी कहानी, विजुअल प्रस्तुति, दर्शकों तक पहुँच और पूरी टीम के तालमेल पर भी रहता है। एक कलाकार होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मैं हर विभाग की जरूरत और चुनौतियों को समझ पाती हूँ। जब निर्देशक, लेखक, संगीतकार, कैमरा टीम और कलाकार एक ही सोच के साथ काम करते हैं, तभी कोई प्रोजेक्ट प्रभाव छोड़ता है। मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि हर सदस्य को अपनी रचनात्मकता दिखाने का पूरा अवसर मिले और अंतिम प्रस्तुति दर्शकों के दिल तक पहुँचे।
‘फकीरी’ को कल्पना से पर्दे तक पहुँचाने में आपकी टीम का योगदान कितना महत्वपूर्ण रहा?
‘फकीरी’ मेरे लिए सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि एक सामूहिक रचनात्मक यात्रा रही। इसकी शुरुआत से ही निर्देशक नीरज गौतम के साथ गाने की अवधारणा, स्टोरीबोर्ड और विजुअल ट्रीटमेंट पर करीब डेढ़ महीने तक विस्तार से काम किया गया। मेरा मानना है कि गाने के प्रभावशाली दृश्य और उसकी प्रस्तुति का बड़ा श्रेय उन्हें जाता है। पूरी शूटिंग चंडीगढ़ हाईवे की एक ही लोकेशन पर एक दिन में पूरी हुई। बीच में करीब ढाई घंटे बारिश के कारण काम रुका, लेकिन मजबूत प्री-प्रोडक्शन और पूरी टीम की तैयारी के कारण शूट बिना किसी बड़ी परेशानी के समय पर पूरा हो गया। कैमरामैन भागीरथ सिंह ने गाने के भावों को खूबसूरती से कैमरे में उतारा। सलोनी ने पूरे शूट का समन्वय संभाला और वीडियो में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उर्मिला जी ने अकेले पूरी टीम का मेकअप संभालकर सभी कलाकारों का स्वाभाविक लुक बनाए रखा। वहीं रवि सिंह और उनकी म्यूजिशियन टीम ने वीडियो में बैंड की प्रस्तुति को इतनी सहजता से निभाया कि दर्शकों को वास्तविक लाइव परफॉर्मेंस का अनुभव हुआ। मेरे लिए ‘फकीरी’ इस बात का प्रमाण है कि किसी भी अच्छे गीत की सफलता केवल उसकी आवाज़ या चेहरे से तय नहीं होती, बल्कि उसके पीछे काम करने वाली पूरी टीम की मेहनत, आपसी विश्वास और रचनात्मक तालमेल उसे यादगार बनाते हैं।
मुंबई की यात्रा में ममता कंडोई का साथ आपके लिए कितना अहम रहा?
मुंबई की मेरी यात्रा ममता कंडोई जी के बिना अधूरी है। मैं कई वर्षों तक उनके साथ रही और उन्होंने हमेशा परिवार की तरह मेरा साथ दिया। कोविड के बाद जब मेरा वजन काफी बढ़ गया था, तब उन्होंने मुझे दोबारा फिटनेस की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। आज भी मैं सप्ताह में तीन दिन उनकी ऑनलाइन फिटनेस क्लास लेती हूँ। उनसे मैंने सीखा कि एक कलाकार के लिए केवल अच्छी आवाज़ ही नहीं, बल्कि अनुशासित जीवनशैली, शारीरिक फिटनेस और मानसिक संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं। मुंबई जैसे प्रतिस्पर्धी शहर में संघर्ष के दौर में उनका साथ मेरे लिए लगातार हौसला, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बना रहा। इसलिए मैं मानती हूँ कि मेरी इस यात्रा में उनका योगदान हमेशा विशेष और अविस्मरणीय रहेगा।

आपके संयुक्त परिवार ने आपके संगीत के सपने को किस तरह मजबूती दी?
मेरे लिए परिवार का सहयोग मेरी संगीत यात्रा की सबसे बड़ी ताकत रहा है। सच कहूँ तो अगर मेरे माता-पिता और मेरे सास-ससुर का विश्वास और साथ मुझे नहीं मिला होता, तो शायद मैं अपने संगीत के सफर को इस तरह निरंतर आगे नहीं बढ़ा पाती। मेरे संगीत के सफर की सबसे भावुक और यादगार यादों में से एक मेरी पहली मुंबई यात्रा है। जब मैं पहली बार अपने संगीत के सपनों को लेकर मुंबई गई थी, तब मेरे पिताजी खुद मेरे साथ मुंबई गए थे। उस समय मुंबई मेरे लिए एक बिल्कुल नई दुनिया थी नई जगह, नए लोग और अपने सपने को हकीकत में बदलने की एक बड़ी चुनौती। लेकिन उस अनजान शहर में पिताजी का मेरे साथ होना मेरे लिए बहुत बड़ी हिम्मत थी। मुझे महसूस हुआ कि मैं अकेली नहीं हूँ और मेरे परिवार का भरोसा मेरे साथ है। आज भी मेरी पहली मुंबई यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक शहर की यात्रा नहीं, बल्कि मेरे संगीत के सपने की ओर बढ़ाया गया पहला बड़ा कदम है। शादी के बाद मेरे ससुर श्री सनत कुमार गुप्ता ने भी मेरे संगीत और मेरे सपनों को बहुत सम्मान दिया। उन्होंने मुझे कभी केवल बहू के रूप में नहीं देखा, बल्कि हमेशा बेटी की तरह अपनाया। उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि शादी के बाद मेरे सपनों पर कोई बंदिश आ गई है। जब मैं संगीत की साधना, स्टेज कार्यक्रमों या अपने प्रोफेशनल प्रोजेक्ट्स में व्यस्त रहती थी, तब परिवार ने घर की जिम्मेदारियाँ मिलकर संभालीं। इस वजह से मुझे अपने संगीत को समय देने और अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला। मेरे माता-पिता और मेरे सास-ससुर ने मेरे संगीत को सिर्फ मेरा सपना नहीं समझा, बल्कि हर कदम पर उसे आगे बढ़ाने में मेरा साथ दिया। मेरे लिए यही उनके प्यार और विश्वास की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने मुझे परिवार और संगीत के बीच किसी एक को चुनने की स्थिति में कभी नहीं रखा। उनके सहयोग से मैं घर की जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने सपने को भी आगे बढ़ा सकी। मैं मानती हूँ कि कलाकार की यात्रा में मेहनत और प्रतिभा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी अपनों का विश्वास भी है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो अपनी पहली मुंबई यात्रा से लेकर आज तक के सफर में मुझे अपने परिवार का साथ हर पड़ाव पर दिखाई देता है।
मेरे लिए मेरे परिवार का यह विश्वास ही मेरे संगीत सफर की सबसे बड़ी ताकत और सबसे खूबसूरत पूंजी है।

शादी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बाद अपने सपनों को पीछे छोड़ देने वाली महिलाओं से आप क्या कहना चाहेंगी?
मैं अपनी ही यात्रा का उदाहरण देना चाहूँगी। शादी, परिवार और बच्चे की जिम्मेदारियों के बीच कई बार लगता है कि अपने सपनों के लिए समय निकालना मुश्किल है, लेकिन अगर परिवार का विश्वास और आपका समर्पण साथ हो, तो रास्ते बनते चले जाते हैं। मेरे लिए भी यह सफर आसान नहीं था, लेकिन मैंने सीखा कि परिस्थितियों से समझौता किया जा सकता है, सपनों से नहीं। इसलिए मैं हर महिला से यही कहना चाहूँगी कि अपनी पहचान और अपने जुनून को कभी पीछे मत छोड़िए। शुरुआत चाहे देर से हो, लेकिन अगर कदम लगातार आगे बढ़ते रहें तो मंजिल जरूर मिलती है। शीतल जी, बातचीत के दौरान मैंने एक दिलचस्प बात नोटिस की—आप अक्सर “आता हूँ”, “जाता हूँ” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। क्या यह बचपन से चली आ रही आदत है, या आपके व्यक्तित्व से जुड़ी कोई खास बात?
देखिए, इसके पीछे कोई खास सोच नहीं है। मैं बचपन से ही ऐसी हूँ और अब लगता है कि यही मेरी पहचान का हिस्सा बन गया है। हम दो बहनें हैं और मैं छोटी हूँ। बचपन में बहुत लाड़-प्यार मिला, तो बोलते-बोलते “मैं आता हूँ”, “मैं जाता हूँ” जैसे शब्दों की आदत पड़ गई। मैं थोड़ी टॉमबॉय भी थी। गुड़ियों के साथ खेलती थी, लेकिन उसके साथ झूले से बहुत ऊँची छलांग लगाना और कुछ अतरंगी चीजें करना भी मुझे बहुत पसंद था। मेरा वह टॉमबॉय वाला नेचर शायद मेरी बोलचाल में भी रह गया। अब तो यह मेरे साथ इतना जुड़ गया है कि अगर मुझे कहीं “मैं आती हूँ, मैं जाती हूँ” कहना पड़े, तो मुझे लगता है—ये मैं नहीं हूँ। मुंबई में इंडस्ट्री के कुछ लोग तो मेरी इस बोलचाल की वजह से मुझे बंगाली भी समझ लेते हैं, क्योंकि बंगाली भाषा में भी इस तरह का जेंडर इस्तेमाल होता है। लेकिन जब वे मेरी पूरी हिंदी सुनते हैं तो उन्हें समझ आता है कि मेरी हिंदी बिल्कुल सामान्य है। तो बस, बचपन की वही आदत आज मेरी अपनी एक अलग पहचान बन गई है। मैं जैसी हूँ, वैसी ही हूँ और मुझे लगता है कि अपनी पहचान के लिए किसी और जैसा बनने की जरूरत नहीं है।

‘फकीरी’ के बाद आपके प्रशंसक किन नए प्रोजेक्ट्स और संगीत यात्राओं की उम्मीद कर सकते हैं?
‘फकीरी’ मेरे लिए एक नई शुरुआत है, मंज़िल नहीं। आने वाले समय में कई नए गीत, स्वतंत्र संगीत परियोजनाएँ और कुछ फिल्मी प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। साथ ही मैं ऐसे रचनात्मक प्रयोग भी करना चाहती हूँ, जिनमें संगीत के साथ भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सकारात्मक सोच का संदेश लोगों तक पहुँचे। मेरा प्रयास रहेगा कि हर नया गीत केवल मनोरंजन तक सीमित न रहे, बल्कि श्रोताओं के दिल और जीवन दोनों को भी छू सके। मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में मेरे श्रोता मुझे कुछ नए, सार्थक और अलग अंदाज़ में भी देखेंगे।
इस बातचीत से…
शीतल गुप्ता का सफर यह साबित करता है कि प्रतिभा को सही दिशा तब मिलती है, जब उसके साथ निरंतर मेहनत, अनुशासन और परिवार का विश्वास जुड़ा हो। देहरादून से मुंबई तक की उनकी यात्रा केवल एक प्लेबैक सिंगर बनने की कहानी नहीं, बल्कि लगातार सीखने, नई जिम्मेदारियाँ स्वीकार करने और हर चुनौती को अवसर में बदलने का उदाहरण भी है। गायिका, गीतकार, संगीतकार, निर्माता और क्रिएटिव प्रोफेशनल के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है।उनकी यह यात्रा बताती है कि सपनों को साकार करने के लिए केवल प्रतिभा ही नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, निरंतर प्रयास और अपनों का विश्वास भी उतना ही आवश्यक होता है।