न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल
म्यूजिक वीडियो में शादी का माहौल दिखाने के लिए अक्सर भव्य सेट तैयार किए जाते हैं। लेकिन ‘बन्नो’ ने इस परंपरागत तरीके से अलग रास्ता चुना। यहां शादी का सेट बनाया ही नहीं गया — एक असली शादी को ही शूटिंग का हिस्सा बना दिया गया। गुड़गांव में हुई एक वास्तविक शादी के बीच कैमरा लगाया गया और दूल्हा-दुल्हन से लेकर परिवार और रिश्तेदारों तक, शादी की वास्तविक हलचल को वीडियो में शामिल किया गया। पूरा शूट करीब 6 से 7 घंटे में पूरा गाना शूट कर लिया गया।
जब जिंदगी ही बन गई शूटिंग का सेट
‘बन्नो’ के पीछे सोच साफ थी—शादी को सिर्फ दिखाना नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक खुशी और भावनाओं को कैमरे में कैद करना। फिल्मी सेट पर हर चीज को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन असली शादी में माहौल अपने आप बनता है। दूल्हा-दुल्हन की खुशी, परिवार की व्यस्तता और रिश्तेदारों की मौजूदगी ने वीडियो को वह सहजता दी, जिसे दोबारा तैयार करना आसान नहीं होता। रियल लोकेशन की यही अनिश्चितता ‘बन्नो’ की शूटिंग का हिस्सा बन गई।
लोक परंपरा से मॉडर्न बीट तक
‘बन्नो’ की कहानी सिर्फ विजुअल प्रयोग तक सीमित नहीं है। इसका संगीत भारतीय शादी-ब्याह की लोक परंपरा से जुड़ता है, जहां बन्ना-बन्नी के गीत लंबे समय से विवाह समारोहों का हिस्सा रहे हैं। इसी लोकभाव को आधुनिक बीट और कंटेंपरेरी साउंड (contemporary sound) के साथ पेश करने की कोशिश की गई है। गीत में शादी की खुशी के साथ उन रिश्तों की झलक भी मिलती है, जो विवाह के बाद दुल्हन की नई जिंदगी का हिस्सा बनते हैं—सास, ससुर, ननद और नया परिवार। यानी पुराने सांस्कृतिक भाव को आज के संगीत श्रोताओं तक पहुंचाने की कोशिश ‘बन्नो’ के केंद्र में है।
जब कैमरा रोल कर रहा था और लोग फ्रेम में आ गए
रियल वेडिंग में शूटिंग का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि हर पल आपके नियंत्रण में नहीं होता। लिप्सिंग का एक टेक चल रहा था। कैमरा रोल कर रहा था और तभी दूल्हा-दुल्हन के मेकअप से जुड़े कुछ लोग शूटिंग एरिया में आ गए। टेक चल रहा था, इसलिए टीम शूट रोक नहीं सकती थी। स्थिति इतनी मजेदार हो गई कि कलाकारों को अपना शॉट जारी रखना पड़ा और कैमरे के पीछे मौजूद टीम के लिए हंसी रोकना मुश्किल हो गया। यही रियल लोकेशन की खूबसूरती है—कुछ सबसे यादगार पल प्लान नहीं किए जाते।
शीतल गुप्ता: सिंगिंग से आगे अपनी पहचान
‘बन्नो’ की सिंगर शीतल गुप्ता के लिए यह प्रोजेक्ट इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट के रूप में अपनी पहचान बनाने की यात्रा का हिस्सा है। संगीत के साथ वह सॉफ्ट स्किल्स कोच और इमेज कंसल्टेंट के तौर पर भी काम करती हैं। उनके अनुसार किसी कलाकार की पहचान सिर्फ उसकी प्रतिभा से नहीं बनती; कम्युनिकेशन, पब्लिक प्रेजेंटेशन, व्यवहार और अपनी पर्सनैलिटी को सही तरीके से प्रस्तुत करना भी महत्वपूर्ण है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में कलाकार के लिए अपनी आवाज के साथ अपनी पहचान बनाना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
अब अगला पड़ाव फिल्म
‘बन्नो’ के बाद शीतल गुप्ता का अगला पड़ाव एक फिल्मी प्रोजेक्ट है। उनके मुताबिक वह एक फिल्म के लिए तीन गाने लिख रही हैं, जिनमें से एक गाना वह खुद गाएंगी। ‘बन्नो’ इसलिए भी दिलचस्प है कि इसमें लोक परंपरा, आधुनिक संगीत और वास्तविक जिंदगी एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं। और इसकी पूरी कहानी शायद इसी एक पंक्ति में सिमट जाती है —‘ओ रे बन्नो, तेरी सास नख चढ़ी…’ यह एक खूबसूरत लोकगीत है। जिसमें लोकगीत की मिठास के साथ छेड़छाड़ भरा चुलबुला अंदाज़ भी देखने को मिलता है। सेट बनाने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि उस दिन जिंदगी खुद कैमरे के सामने सबसे खूबसूरत सेट बन गई।



