नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को कानूनी संरक्षण देने वाले संशोधन विधेयक के संसद से पारित होने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा नहीं दिया जा सकता। उनका तर्क है कि दोनों की प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग हैं।
लोकसभा में उठाया संवैधानिक सवाल
लोकसभा में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान ओवैसी ने कहा कि ‘जन गण मन’ देश और उसके नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ में देवी स्वरूप की आराधना का वर्णन है। उन्होंने कहा कि दोनों की तुलना करना उचित नहीं है।
ओवैसी ने यह भी कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने वाले अनेक लोगों की भावनाओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, वर्ष 1950 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत घोषित करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि इसके लिए संसद में औपचारिक प्रस्ताव नहीं लाया गया था।
संविधान के प्रावधानों का भी किया जिक्र
एआईएमआईएम सांसद ने कहा कि देश के संविधान में “राष्ट्रीय गीत” की अलग से कोई परिभाषा नहीं दी गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 में निहित धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े सवाल भी खड़े करता है।
लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो चुका है विधेयक
इससे पहले राज्यसभा की मंजूरी मिलने के बाद Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 गुरुवार को लोकसभा से भी पारित हो गया। अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून के रूप में लागू होगा।
सरकार ने बताया उद्देश्य
केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का मकसद राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को वही कानूनी संरक्षण प्रदान करना है, जो वर्तमान में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान को प्राप्त है। सरकार के अनुसार, इस कानून से राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को और अधिक मजबूती मिलेगी।