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कानपुर के जाना गांव में ज़हरीले पानी का कहर: जन्मजात विकलांगता, किडनी फेल्योर और त्वचा रोगों ने ग्रामीणों की ज़िंदगी कर दी बदहाल
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कानपुर के जाना गांव में ज़हरीले पानी का कहर: जन्मजात विकलांगता, किडनी फेल्योर और त्वचा रोगों ने ग्रामीणों की ज़िंदगी कर दी बदहाल

रिपोर्ट – अनुराग श्रीवास्तव – कानपुर

कानपुर : उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर देश के सबसे बड़े चमड़ा उद्योग (लेदर टैनरी) हब के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसी उद्योग का अनट्रीटेड केमिकल कचरा अब स्थानीय लोगों के लिए मौत का पर्याय बन गया है। शहर से सटे महाराजपुर क्षेत्र के जाना गांव की स्थिति आज बेहद गंभीर है। गंगा नदी में मिलने वाले टेनरियों के ज़हरीले अपशिष्ट के कारण भूजल इतना दूषित हो चुका है कि ग्रामीणों का पीने का पानी ही उनकी जान ले रहा है।

गाँव मे रहने वालों का कहना है कि गाँव में हर दूसरा घर बीमारी की चपेट में है। बच्चे जन्मजात शारीरिक विकलांगता के साथ पैदा हो रहे हैं। कई बच्चे पैरों पर खड़े होने में असमर्थ हैं तो कई के हाथ-पैर विकृत हैं। बड़ों में त्वचा रोग, किडनी फेल्योर, लिवर सिरोसिस और लगातार दस्त जैसी बीमारियाँ आम हो गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शरीर पर होने वाले चकत्ते और घाव सालों से ठीक नहीं हो रहे। गर्भवती महिलाओं में बार-बार गर्भपात और पशुओं की अकाल मृत्यु भी अब रोज़मर्रा की बात हो गई है। यहां तक कि पशुओं का दूध भी कम हो गया है और जो दूध निकलता है, उसे पीने से इंसान और बच्चे दोनों बीमार पड़ रहे हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि टेनरियों से निकलने वाला क्रोमियम, लेड, आर्सेनिक और मरकरी युक्त केमिकल युक्त पानी सीधे नालों के जरिए गंगा में जा रहा है और रिसाव से भूजल प्रदूषित हो रहा है। नतीजा यह है कि गाँव के सारे हैंडपंप और कुएँ जहरीले हो चुके हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि क्षेत्र के विधायक और उत्तर प्रदेश विधानसभा के स्पीकर सतीश महाना का पैतृयोजना पत्थर गाँव में लगा हुआ है, लेकिन सरकारी पानी की टंकी सालों से खाली पड़ी है। एक बूंद पानी नहीं। मजबूरन ग्रामीणों ने अपने खर्चे से चंदा इकट्ठा कर कई हैंडपंप ठीक करवाए हैं, पर वो पानी भी अब पीने लायक नहीं रहा।

मामला सामने आने के बाद कानपुर की महापौर प्रमिला पांडे ने तत्काल संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा, “मैंने अधिकारियों को तुरंत निर्देश दिए हैं कि कल सुबह से ही जाना गाँव में टैंकरों से पीने योग्य पानी की सप्लाई शुरू की जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब किया गया है। यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही पाई गई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

स्थानीय लोग लंबे समय से इस समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो सका। विशेषज्ञों का कहना है कि भूजल में भारी मात्रा में क्रोमियम-6 पाया गया है, जो कैंसरकारक है और लंबे समय तक संपर्क में रहने से किडनी, लिवर और त्वचा को स्थायी नुकसान पहुँचाता है।

जाना गाँव आज एक जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे बिना नियंत्रण के औद्योगिक विकास आम जनता की सेहत पर भारी पड़ रहा है। प्रशासन भले ही अब जागा हो, लेकिन सवाल यह है कि इतने सालों तक यह ज़हर पीने को क्यों मजबूर लोगों की ज़िंदगी कौन लौटाएगा? और सबसे बड़ा सवाल कानपुर की सैकड़ों टेनरियों का जहरीला कचरा कब तक गंगा और भूजल को मारता रहेगा?

जिम्मेदार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों का अबतक मौन होना इन गाँव वाशियों के लिए कहीं न कहीं दिल दुखाने जैसा है, अब ऐसे में महापौर का मामले में संज्ञान लेना गांव वालों के लिए राहत भरी खबर के आसार है ।

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