डॉ राकेश वर्मा
15 जून 2026: कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता और पंजीकरण की मांग की है। उन्होंने RSS को ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ (व्यक्तियों का निकाय) कहकर संबोधित करते हुए कहा है कि दस्तावेज तैयार रखें और पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करें। मंत्री खड़गे ने तर्क दिया कि देश में स्ट्रीट वेंडर्स से लेकर एनजीओ, कंपनियों और अन्य संगठनों को रजिस्ट्रेशन और कर चुकाने की बाध्यता है, तो RSS को इससे मुक्ति क्यों मिलनी चाहिए? उन्होंने कर्नाटक में RSS की गतिविधियों का हवाला देते हुए 4,127 दैनिक शाखाओं, लाखों प्रतिभागियों और एक समान वर्दीधारी मार्च जैसी जानकारियां मांगी हैं। साथ ही आय, फंडिंग स्रोत, कर भुगतान और सार्वजनिक गतिविधियों का पूरा विवरण भी मांगा गया है।
मंत्री का मुख्य बिंदु:
“अगर देश का हर नागरिक, हर संस्था संविधान के तहत जवाबदेह है, तो RSS क्यों नहीं? बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स होने का मतलब यह नहीं कि वे कर और पंजीकरण से बच जाएं। यह बयान और पत्र उन आरोपों के बीच आया है जिनमें RSS पर फंडिंग की पारदर्शिता और कर छूट के मुद्दे उठाए जाते रहे हैं। कुछ आलोचक कहते हैं कि RSS अन्य संगठनों की तरह औपचारिक रूप से सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट या ट्रस्ट के तहत पंजीकृत नहीं है, जिससे ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ का दर्जा मिलता है और कुछ कर संबंधी छूट के सवाल उठते हैं।

RSS का पक्ष:
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने इस मांग को राजनीतिक चाल बताया है। उन्होंने कहा कि RSS कोई गुप्त संगठन नहीं है, यह सार्वजनिक रूप से काम करता है। संगठन ने अतीत में तीन बार प्रतिबंध झेला और अदालतों ने उसे बरी किया। भागवत के अनुसार, बिना सरकारी फंडिंग वाले सांस्कृतिक या स्वैच्छिक संगठनों के लिए ऐसा पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। RSS स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक योगदान (गुरुदक्षिणा) पर चलता है और संविधान के दायरे में ही कार्य करता है।

राजनीतिक संदर्भ:
कांग्रेस शासित कर्नाटक में यह मुद्दा भाजपा और RSS के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव का हिस्सा है। प्रियंक खड़गे पहले भी RSS की फंडिंग, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोप लगा चुके हैं। दूसरी ओर, भाजपा और RSS समर्थक इसे कांग्रेस की ‘वेंडेटा पॉलिटिक्स’ बताते हैं और कहते हैं कि RSS एक सांस्कृतिक संगठन है जो राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ी हुई है। कुछ लोग मंत्री के बयान को ‘हाइपोक्रिसी’ का मुद्दा बताते हुए कहते हैं कि कई राजनीतिक दल और संगठन खुद पारदर्शिता के मामले में कमजोर हैं। वहीं दूसरे पक्ष का तर्क है कि कोई भी बड़ा संगठन जो लाखों लोगों को प्रभावित करता है, उसे जवाबदेह होना चाहिए।
प्रियंक खड़गे का यह कदम कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस और RSS के बीच नई बहस छेड़ चुका है। अब देखना होगा कि RSS इस पत्र का औपचारिक जवाब कैसे देता है और क्या कोई कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई आगे बढ़ती है। यह मुद्दा भारत में स्वैच्छिक संगठनों की कानूनी स्थिति, कराधान और पारदर्शिता पर व्यापक चर्चा को जन्म दे रहा है।