न्यूयॉर्क| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड: वन ह्यूमैनिटी’ धर्मगुरुओं के सम्मेलन में धार्मिक विविधता, सामाजिक एकता और मानवता पर अपने विचार रखे। अलग-अलग धर्मों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में भागवत ने कहा कि पूजा-पद्धतियां और धार्मिक अनुशासन भले अलग हों, लेकिन मानवता और अंतिम सत्य एक ही है। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम संबंधों का भी जिक्र किया। भागवत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति खुद को हिंदू मानते हुए यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदुत्व की मूल भावना को नहीं समझता। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी गरिमा है और इंसानों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
‘विविधता को बचाना होगा, एकता दुनिया का सबसे बड़ा सच’
मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया की विविधता को संरक्षित करना जरूरी है, क्योंकि यह प्रकृति का हिस्सा है। उन्होंने एकता को मानव समाज की बुनियादी सच्चाई बताते हुए कहा कि अलग-अलग धार्मिक रास्ते होने के बावजूद इंसानियत एक है। उन्होंने कहा कि वह खुद को धार्मिक विद्वान या किसी धर्म का अधिकारी नहीं मानते, लेकिन जिस सामाजिक परंपरा से वह जुड़े हैं, उसमें लंबे समय से यह विचार रहा है कि धर्म अलग हो सकते हैं, मगर मानवता एक है।
सत्य एक, उसे देखने का नजरिया अलग-अलग
संघ प्रमुख ने कहा कि मूल सत्य एक ही होता है, लेकिन उसे समझने और व्यक्त करने के तरीके अलग हो सकते हैं। उनके मुताबिक इंसान अपने अनुभव, सोच और समझ के दायरे के आधार पर सत्य को देखने की कोशिश करता है। उन्होंने कहा कि दुनिया में मौजूद अलग-अलग धर्मों की अपनी परंपराएं, रीति-रिवाज और अनुशासन हैं। किसी आध्यात्मिक मार्ग को अपनाने में इन परंपराओं की अपनी भूमिका होती है, लेकिन इन विविधताओं के बावजूद मानवता को एक नजर से देखना जरूरी है।
मुस्लिम और ईसाई समुदायों से संवाद का किया जिक्र
मोहन भागवत ने भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संघ की ओर से किए जा रहे संवाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संवाद जरूरी है, लेकिन इसे सेवा से अलग नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चलनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि संघ के सेवा कार्यों में किसी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं किया जाता। भागवत ने कहा कि संगठन को लेकर कई बार गलत धारणाएं और नैरेटिव सामने आते हैं, लेकिन जब लोग स्वयं आकर उसके काम को देखते और समझते हैं तो उनकी धारणा बदल सकती है। भागवत ने यह भी कहा कि संघ अपने सेवा कार्यों का प्रचार करने में ज्यादा रुचि नहीं रखता। संगठन का ध्यान काम करने पर अधिक और उसके प्रचार-प्रसार पर कम रहा है।
राजनीति और जनमत पर भी बोले RSS प्रमुख
अपने संबोधन में भागवत ने मौजूदा राजनीति और जनमत के प्रभाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दल और नेता जनता की राय से प्रभावित होते हैं और किसी भी राजनेता के लिए जनमत के विपरीत जाना आसान नहीं होता। उन्होंने कहा कि अगर युद्ध रोकने और दुनिया में सकारात्मक बदलाव लाने हैं तो राजनीति को भी प्रभावित करना होगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति को प्रभावित करने का उद्देश्य सत्ता हासिल करना या निजी हित साधना नहीं, बल्कि समाज और दुनिया को सही दिशा में आगे बढ़ाना होना चाहिए।