अभिषेक यादव
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई दुश्मनियां चर्चा में रहीं, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दिवंगत माफिया-राजनेता मुख्तार अंसारी के बीच की अदावत अलग थी। यह सिर्फ दो नेताओं की राजनीतिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि पूर्वांचल में वर्चस्व, विचारधारा, सत्ता और सड़कों पर उतर चुकी हिंसा की ऐसी कहानी थी, जिसने दशकों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति को प्रभावित किया।
एक तरफ गोरखपुर मठ से निकला हिंदुत्व का तेजतर्रार चेहरा योगी आदित्यनाथ थे, तो दूसरी तरफ मऊ, गाजीपुर और आसपास के इलाकों में मजबूत पकड़ रखने वाला बाहुबली मुख्तार अंसारी। दोनों के रास्ते अलग थे, सोच अलग थी और राजनीति का तरीका भी अलग था। लेकिन जब ये दो ध्रुव आमने-सामने आए, तो पूर्वांचल की राजनीति में एक ऐसी जंग शुरू हुई, जो वक्त के साथ और भी गहरी होती चली गई।
साल 2005 …. मऊ दंगा: जहां से शुरू हुई टकराव की कहानी
पूर्वांचल का मऊ जिला सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा था। दंगों के दौरान मुख्तार अंसारी का नाम खुलकर सामने आया। आरोप लगे कि वह खुलेआम हथियार लहराते हुए दंगा प्रभावित इलाकों में घूम रहा था। उस वक्त समाजवादी पार्टी की सरकार थी और योगी आदित्यनाथ ने तत्कालीन सरकार पर मुख्तार को संरक्षण देने का आरोप लगाया। गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ ने मऊ जाने और पीड़ित हिंदुओं से मिलने का ऐलान किया, लेकिन प्रशासन ने उन्हें जिले की सीमा में प्रवेश करने से पहले ही रोक दिया। यहीं से यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं रही, बल्कि व्यक्तिगत संघर्ष में बदलने लगी।
संसद में छलका दर्द
साल 2007 में लोकसभा का वह दृश्य आज भी चर्चा में रहता है, जब योगी आदित्यनाथ सदन में बोलते-बोलते भावुक हो गए थे। उन्होंने अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी और तत्कालीन सरकार पर राजनीतिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। उस दौर में पूर्वांचल की राजनीति में मुख्तार अंसारी और उसके प्रभाव को लेकर लगातार चर्चाएं होती थीं। योगी के समर्थकों का मानना था कि उन्हें निशाना बनाने के पीछे वही ताकतें सक्रिय थीं, जो मुख्तार के राजनीतिक नेटवर्क से जुड़ी थीं।
2008: जब मौत बनकर टूटा हमला
7 सितंबर 2008… यह तारीख योगी आदित्यनाथ और मुख्तार अंसारी की अदावत का सबसे खतरनाक अध्याय मानी जाती है। योगी आदित्यनाथ हिंदू युवा वाहिनी के कार्यक्रम में शामिल होने आजमगढ़ जा रहे थे। उनका लगभग 40 गाड़ियों का काफिला शहर के तकिया इलाके से गुजर रहा था। तभी अचानक काफिले पर पथराव शुरू हो गया। देखते ही देखते पेट्रोल बम फेंके गए और गोलियां चलने लगीं। पूरा इलाका रणक्षेत्र में बदल गया।
हमले में योगी आदित्यनाथ के एक समर्थक की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए। बाद में इस हमले के पीछे मुख्तार अंसारी गैंग का नाम सामने आया। पूर्व पुलिस अधिकारियों और योगी आदित्यनाथ के करीबी लोगों ने भी इस हमले के पीछे मुख्तार गैंग की भूमिका होने का दावा किया। कहा जाता है कि उस दिन योगी आदित्यनाथ की जान महज कुछ सेकंड और एक फैसले की वजह से बची थी। वह आमतौर पर अपने काफिले की सातवीं गाड़ी में बैठते थे, लेकिन आखिरी समय में उन्होंने गाड़ी बदल ली थी। हमलावरों ने जिस गाड़ी को निशाना बनाया, उसमें योगी मौजूद नहीं थे। उस घटना के बाद यह साफ हो गया था कि दोनों पक्षों के बीच की लड़ाई अब राजनीतिक सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी है।
2017: सत्ता बदली और तस्वीर भी
साल 2017 में योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद मुख्तार अंसारी और उसके नेटवर्क पर सरकार की कार्रवाई तेज हो गई। मुख्तार उस समय पंजाब की रोपड़ जेल में बंद था। योगी सरकार ने कानूनी लड़ाई लड़ते हुए उसे उत्तर प्रदेश वापस लाने की प्रक्रिया शुरू की। आखिरकार मुख्तार को बांदा जेल शिफ्ट किया गया। इसके बाद मुख्तार अंसारी और उसके गैंग के आर्थिक साम्राज्य पर बड़ा प्रहार हुआ। सरकार ने कार्रवाई करते हुए सैकड़ों करोड़ की संपत्तियों को कुर्क किया, कई अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाया गया और गैंग से जुड़े लोगों पर लगातार शिकंजा कसता गया।
वैचारिक टकराव से व्यक्तिगत जंग तक
योगी आदित्यनाथ और मुख्तार अंसारी की कहानी सिर्फ दो नेताओं की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है, जब पूर्वांचल की राजनीति में बाहुबल, जातीय समीकरण, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सत्ता की लड़ाई एक साथ चल रही थी। एक तरफ योगी आदित्यनाथ खुद को कानून और हिंदुत्व की राजनीति के प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे थे, तो दूसरी तरफ मुख्तार अंसारी पूर्वांचल में अपने राजनीतिक और बाहुबली प्रभाव के दम पर मजबूत पकड़ बनाए हुए था। समय के साथ यह संघर्ष इतना गहरा हो गया कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति की सबसे चर्चित और ऐतिहासिक अदावतों में शामिल हो गया।
