नई दिल्ली| केंद्र सरकार अब औपनिवेशिक दौर की पहचान माने जाने वाले “सिविल लाइन्स” नाम को बदलने पर विचार कर रही है। यह कदम देशभर में ब्रिटिश काल से जुड़े प्रतीकों को हटाने और भारतीय पहचान को मजबूत करने की पहल का हिस्सा माना जा रहा है।
औपनिवेशिक विरासत खत्म करने की दिशा में पहल
सरकार के सूत्रों के अनुसार, अलग-अलग मंत्रालयों को ऐसे नामों और प्रतीकों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं, जिन्हें भारतीय संस्कृति और विरासत से जुड़े नामों से बदला जा सके। इसी क्रम में पहले भी कई बदलाव किए जा चुके हैं। राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया गया, जबकि रेस कोर्स रोड को अब लोक कल्याण मार्ग के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा, इंडिया गेट परिसर में स्थित ग्रैंड कैनोपी के नीचे जॉर्ज पंचम की प्रतिमा हटाकर सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गई। भारतीय नौसेना के ध्वज में भी बदलाव कर औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाया गया है।
बड़े स्तर पर बदलाव
सरकार ने अब तक औपनिवेशिक काल के 1,500 से अधिक पुराने कानूनों को खत्म किया है। नए सरकारी भवनों और संस्थानों के नामकरण में भी भारतीयता को प्राथमिकता दी जा रही है। नए संसद भवन और अन्य प्रशासनिक ढांचे को इसी सोच के तहत विकसित किया गया है। “सिविल लाइन्स” शब्द की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उस समय शहरों को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता था—जहां अंग्रेज अफसर रहते थे, उसे “सिविल लाइन्स” कहा जाता था। यह इलाका आमतौर पर शहर के बाकी हिस्सों से अलग और व्यवस्थित होता था, जहां चौड़ी सड़कें, बड़े बंगले और प्रशासनिक इमारतें होती थीं।
इसके अलावा, सेना के लिए अलग “मिलिट्री लाइन्स” (छावनी क्षेत्र) और स्थानीय भारतीय आबादी के लिए “ओल्ड सिटी” जैसे हिस्से बनाए जाते थे। पुरानी दिल्ली इसका प्रमुख उदाहरण है। अब सरकार इसी ऐतिहासिक संदर्भ को देखते हुए “सिविल लाइन्स” जैसे नामों को बदलने पर विचार कर रही है, ताकि औपनिवेशिक पहचान की जगह भारतीय सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा दिया जा सके।