पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। राज्य की सत्ता अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों में जाती दिख रही है, जबकि ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट से हार इस चुनाव का सबसे बड़ा झटका साबित हुई है। भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल करते हुए सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है, जबकि तृणमूल कांग्रेस सीमित सीटों पर सिमट गई है।
इस बड़े राजनीतिक बदलाव के साथ अब चर्चा केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि सरकारी प्रोटोकॉल की भी हो रही है। नियमों के अनुसार, जैसे ही नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति होती है, पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी आवास खाली करना अनिवार्य हो जाता है।
आम तौर पर, पद छोड़ने या चुनाव हारने के बाद 15 दिनों से लेकर एक महीने के भीतर सरकारी बंगला खाली करना होता है। कई मामलों में प्रशासन 15 दिन की सख्त समय सीमा तय करता है, जबकि विशेष परिस्थितियों में इसे अधिकतम एक महीने तक बढ़ाया जा सकता है।
सरकारी बंगलों को लेकर Supreme Court of India का रुख पहले से ही सख्त रहा है। अदालत ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी आवास देने की व्यवस्था को समाप्त कर दिया था। कोर्ट ने साफ कहा है कि पद छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री की स्थिति एक सामान्य नागरिक जैसी हो जाती है, इसलिए उन्हें निर्धारित समय सीमा के भीतर आवास खाली करना ही होगा।
इस्तीफे और नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के बीच के समय को ट्रांजिशन पीरियड कहा जाता है। इस दौरान निवर्तमान मुख्यमंत्री कार्यवाहक के रूप में केवल जरूरी प्रशासनिक कार्य ही कर सकते हैं। वे कोई बड़ा नीतिगत निर्णय या नई वित्तीय योजना लागू नहीं कर सकते। जैसे ही भाजपा अपने विधायक दल के नेता का चयन कर शपथ ग्रहण की प्रक्रिया पूरी करेगी, ममता बनर्जी को आधिकारिक आवास खाली करने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।