भोपाल। मध्य प्रदेश में अब सीबीआई को जांच से पहले राज्य सरकार की लिखित अनुमति लेनी होगी। इसका मतलब ये हुआ कि अगर सीबीआई को एमपी में किसी अफसर, कर्मचारी के खिलाफ कोई जांच करनी है तो उसे राज्य सरकार की अनुमति की जरूरत होगी। इतना ही नहीं, एमपी के किसी मंत्री या विधायक की जांच के लिए भी मंजूरी लेनी होगी। अब तक कई राज्यों ने सीबीआई की एंट्री पर अपने यहां बैन लगा रखा है। अब तक जांच के लिए जिन राज्यों में लिखित अनुमति लेनी पड़ती थी, वहां विपक्षी पार्टी की सरकार है लेकिन मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार है।
नोटिफिकेशन में स्पष्ट किया गया है। अन्य अपराधों के लिए राज्य द्वारा दी गई कोई भी पूर्व सामान्य सहमति और केस-दर-केस अनुमति वैध रहेगी। इस अधिसूचना में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 3 द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए कहा गया है। राज्य सरकार की पूर्व लिखित अनुमति के बिना मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नियंत्रित लोक सेवकों से संबंधित मामलों में ऐसी कोई जांच नहीं की जाएगी। जिसका आसान शब्दों में अर्थ है कि बिना एमपी सरकार के परमिशन के सीबीआई किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी पर जांच नहीं कर सकेगी।
अक्टूबर 2012 में जांच के दौरान एमपी सरकार ने भारतीय सेवाओं में एमपी कैडर के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने से सीबीआई को रोक दिया था। राजपत्र अधिसूचना में कहा गया है कि सीबीआई भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 से संबंधित मामलों की जांच करते समय एमपी सरकार की इजाजत जरूरी है।
सीबीआई एमपी कैडर के आईएएस, आईपीएस या भारतीय वन सेवा अधिकारियों के खिलाफ एमपी सरकार की सहमति के बिना जांच या जांच शुरू नहीं कर सकती है। 2018 में केंद्र ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन किया है। इसमें राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए राज्य की सहमति की आवश्यकता थी। खास रूप से उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए निर्णयों या सिफारिशों के लिए। रिश्वतखोरी के लिए मौके पर गिरफ्तारी के लिए अपवाद बनाए गए हैं।