
(न्यूज़ जर्नलिस्ट अंकित कुमार गोयल)
आपने अपने करियर की कैसे शुरुआत की और परिवार का कितना सहयोग मिला?
मेरे करियर की शुरुआत करसोग की उन शांत वादियों से हुई, जहाँ सपनों को हकीकत में बदलने का जज्बा पैदा हुआ। फिर जब मैं पढ़ाई के लिए शिमला आया तो यहाँ मुझे आकाशवाणी शिमला से जुड़ने का अवसर मिला। करियर के शुरुआती दौर में जब मैंने आकाशवाणी शिमला के साथ एक आकस्मिक उद्घोषक (Announcer) के रूप में अपनी यात्रा शुरू की, तो वह मेरे लिए केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि अपनी आवाज के माध्यम से समाज से जुड़ने का एक माध्यम था। जहाँ तक परिवार के सहयोग की बात है, तो मैं आज जो कुछ भी हूँ, उसमें मेरे परिवार की भूमिका नींव की ईंट की तरह है। एक शिक्षक और साधक के रूप में मेरी व्यस्तताओं के बीच, परिवार ने हमेशा मेरी ऊर्जा को संचित रखा है।

जड़ें और उड़ान: करसोग की गलियों से आकाशवाणी शिमला के स्टूडियो और फिर क्लासरूम तक, इस सफर में सबसे बड़ा मोड़ कौन सा रहा?
करसोग की मिट्टी ने मुझे धैर्य सिखाया। मेरे जीवन का सबसे बड़ा मोड़ वह था जब मैंने महसूस किया कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। योग और संस्कृत दोनों ऐसे विषय हैं जिसमें विश्व कल्याण छिपा है आकाशवाणी ने मुझे ‘अभिव्यक्ति’ दी, लेकिन क्लासरूम ने मुझे ‘निर्माण’ का अवसर दिया। आज जब मैं बच्चों को देखता हूँ, उन्हें संस्कृत या योग की बातें बताता हूँ तो ऐसा लगता है कि मैं वास्तव में मेरे गुरुओं द्वारा मुझे दिए गए ज्ञान को समाज की जड़ों तक पहुंचाने के प्रयास में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा हूँ।

शब्द और मौन: उद्घोषक के तौर पर बोलना आपका काम था, योग में मौन का महत्व है। आवाज़ और शांति के बीच आप संतुलन कैसे साधते हैं?
आकाशवाणी या रेडियो में शब्द ही सब कुछ थे, लेकिन योग ने सिखाया कि शब्दों की शक्ति मौन से आती है। जब हम मौन होते हैं, तभी हम स्वयं को सुन पाते हैं। जीवन में सुनाना ही सब कुछ नहीं सुनना भी आवश्यक है खास कर स्वयं को। मैं बच्चों को सिखाता हूँ कि दिन भर की भागदौड़ और शोर के बीच, दिन में 10 मिनट का मौन आपकी आंतरिक ऊर्जा को फिर से जीवित कर सकता है। इसलिए ध्यान करो।

संस्कृत आज के लिए: Gen Z को टिकटॉक और AI के दौर में संस्कृत सीखने के लिए आप कैसे प्रेरित करते हैं?
आज की पीढ़ी तर्कों पर विश्वास करती है केवल कहानी पर नहीं इसलिए मैं बच्चों से कहता हूँ कि संस्कृत दुनिया की सबसे ‘वैज्ञानिक’ भाषा है। आज का कोडिंग स्ट्रक्चर हो या व्याकरण के नियम, संस्कृत का आधार हर जगह है। मैं इसे केवल श्लोकों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें इसके पीछे का तर्क और विज्ञान भी समझाता हूँ, जिससे वे गर्व के साथ इसे अपनाते हैं और उनके मन में जानने की इच्छा बढ़ जाती है और शिक्षण अधिगम सुगम हो जाता है।

योग सिर्फ आसन नहीं: बच्चों को आप योग का वो कौन सा पहलू सिखाते हैं जो मैट से बाहर उनकी ज़िंदगी बदल दे?
मैट पर किया गया आसन शरीर को लचीला बनाता है, लेकिन व्यवहार में लाया गया योग ‘चरित्र’ को लचीला बनाता है। योग के अंतर्गत अष्टांग योग के यम और नियम पर मैं विशेष बल देता हूँ। मैं बच्चों को ‘अनुशासन’ और ‘एकाग्रता’ (Focus) सिखाता हूँ। अगर वे जीवन की किसी भी परीक्षा के तनाव में भी शांत रहना सीख गए, तो समझिए मेरा योग सिखाना सफल रहा।

एक यादगार प्रसारण: आकाशवाणी में आपका ऐसा एक प्रसारण जो आज भी आपके या श्रोताओं के दिल में बसता हो?
आकाशवाणी से एक कार्यक्रम प्रसारित होता था नाम था अमर भारती उस कार्यक्रम को करने का सुअवसर मुझे मिला जिसमें भारत के प्राचीन और रहस्यमय ज्ञान की बातें होती थी। एक संस्कृत और योग का विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए आकाशवाणी के माध्यम से संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों को श्रोताओं तक पहुंचाने का अवसर मिला वो मेरे लिए सबसे बेहतरीन समय था इसके साथ लाइव फोन इन कार्यक्रम में श्रोताओं के साथ बात का अलग ही सुन्दर अनुभव रहता था।

शिक्षक की चुनौती: सेंट एडवर्ड्स जैसे स्कूल में परंपरा और आधुनिकता को साथ लेकर चलने की सबसे बड़ी चुनौती क्या लगती है?
चुनौती यह है कि हम परंपरा को बोझ न बनने दें। सेंट एडवर्ड्स जैसे स्कूल में जहाँ बेहतरीन आधुनिक शिक्षा का बोलबाला है, वहाँ संस्कृत और योग को ‘कूल’ और ‘प्रासंगिक’ (Relevant) बनाकर पेश करना मेरा उद्देश्य रहता है। हम पुरानी जड़ों से जुड़कर ही ऊँची उड़ान भर सकते हैं।
पारिवारिक ऊर्जा: आपने कहा परिवार सबसे बड़ा सुख है। परिवार के साथ बिताया एक ऐसा पल जो आपको हमेशा ताकत देता हो?
परिवार के साथ शाम को बैठकर की गई छोटी-छोटी बातें, मेरी बेटी की मुस्कान और माता-पिता का आशीर्वाद—यही वह पल हैं जो मुझे दिन भर की थकान के बाद फिर से ऊर्जा से भर देते हैं। मेरा मानना है कि जो व्यक्ति घर में खुश है, वह दुनिया में कहीं भी सफल हो सकता है।

गाँव का असर: करसोग की मिट्टी ने आपके व्यक्तित्व में ऐसी कौन सी बात भर दी जो शहर की चमक में भी नहीं बदली?
शहर की चमक कितनी भी हो, मेरे गाँव की सादगी,मिट्टी की खुशबू और अपनों की मदद करने का जज्बा मेरे भीतर आज भी वैसा ही है। वह ‘जमीनी जुड़ाव’ मुझे हर व्यक्ति से जुड़ने की प्रेरणा देता है।

सेवा का अर्थ: आपके लिए ‘समाज सेवा’ एक दिन का काम नहीं, जीवनशैली है। एक आम आदमी कल से इसकी शुरुआत कैसे करे?
समाज सेवा के लिए किसी संस्था की ज़रूरत नहीं है। एक आम आदमी कल से बस इतना शुरू कर दे कि वह अपने आस-पास के लोगों से मुस्कुराकर बात करे और किसी की छोटी सी मदद कर दे। निस्वार्थ भाव से किया गया छोटा सा काम भी समाज सेवा है।

अगला सपना: संस्कृत, योग और उद्घोषणा के बाद, विकास शर्मा का अगला मिशन क्या है?
मेरा अगला मिशन संस्कृत और योग को तकनीक (Digital Media) के माध्यम से घर-घर पहुँचाना है। मैं चाहता हूँ कि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी विरासत पर शर्म नहीं, बल्कि गर्व महसूस करे। योग और अध्यात्म के वैज्ञानिक पहलुओं पर और अधिक शोध करना और उसे सरल भाषा में समाज तक पहुँचाना ही मेरा लक्ष्य है।